सीधा पढ़ें तो रामायण कथा, उल्टा पढ़ें तो कृष्ण कथा; दुनिया का एकमात्र, दुर्लभ और आश्चर्यजनक ग्रंथ !

क्या आपने कभी सोचा है कि दुनिया में ऐसा ग्रंथ भी हो सकता है जिसमें एक ही पुस्तक में दो नायकों की कथा समाहित हो. यकीन नही तो आज हम आपको बताने जा रहे हैं हिन्दू धर्म के ऐसे ग्रंथ के बारे में जो अपने आप में अद्भुत है. इस साहित्य में हैं तो केवल 30 श्लोक लेकिन यह 30 श्लोक ही इसे दुर्लभ, आश्चर्यजनक और दुनिया का एकमात्र ग्रंथ बनाते हैं. इसे अगर सीधा पढ़ें तो रामायण की कथा होती है और अगर इसी को उल्टा कर दें कृष्ण की कथा प्रारंभ हो जाती है. तो आइए जानते हैं इस ग्रंथ के बारे में कुछ खास बातें.

एक ही ग्रंथ में सन्निहित है भगवान राम और श्रीकृष्ण की कथा

क्या ऐसा हो सकता है कि किसी साहित्य को सीधा पढ़े तो रामायण की कथा पढ़ी जाय और जब इसमे लिखे शब्दों को उल्टा पढ़ें तो कृष्ण की कथा चलने लगे. दक्षिण भारत में ऐसा ही एक ग्रंथ है जिसका नाम ‘राघवयादवीयम्’ है. इसे ‘अनुलोम-विलोम’ काव्य भी कहा जाता है. इसकी विशेषता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें केवल 30 श्लोक है लेकिन यह साहित्य दो अलग-अलग मानवीय रुपों का चित्रण करता है. जिस तरह से योग में अनुलोम का मतलब होता है श्वास लेना और विलोम का मतलब होता है श्वास छोड़ना. उसी तरह से इस ग्रंथ के श्लोक को अगर सीधा पढ़ें तो राम की कथा आती है और अगर इसी श्लोक का विलोम कर दें तो श्रीकृष्ण की कथा शुरु हो जाती है.

ग्रंथ का नाम और रचनाकार 

इस ग्रंथ की रचना श्री वेंकटाध्वरि ने किया था जिनका जन्म कांचीपुरम के पास के क्षेत्र अरसनीपलै में हुआ था. वेंकटाध्वरि काव्यशास्त्र के प्रकाण्ड पण्डित थे. वह वेदांत देशिक के अनुयायी माने जाते हैं. वेदांत देशिक जिन्हें वेंकटनाथ भी कहा जाता है, ने ही रामानुजाचार्य द्वारा स्थापित रामानुज संप्रदाय को आगे बढ़ाया.

वेंकटाध्वरि ने १४ ग्रंथों की रचना की जिसमें से ‘ऱाघवयादनवीयम’ और ‘लक्ष्मीसहस्त्रम’ सबसे महत्वपूर्ण है. कहते हैं कि इस ग्रंथ की रचना करते ही उनकी दृष्टि उन्हें वापस मिल गया थी.

‘राघवयादवीयम’ पुस्तक की खासियत

इस ग्रंथ में लिखे गए श्लोक बहुत ही रोचक और अद्भुत हैं. जैसा की नाम से ही प्रतीत होता है राघव यानि की राम और यादव यानि की कृष्ण की गाथा बताने वाली पुस्तक अर्थात ‘राघवयादवीयम्. इस पुस्तक के मात्र 30 श्लोक में ही भगवान राम और श्रीकृष्ण की पूरी गाथा समाहित है. हालांकि श्रीकृष्ण की कथा बताने के लिए श्लोकों का विलोम भी लिखा गया है इसलिए श्ळोकों की संख्या 60 हो जाती है.

उदाहरण के तौर पर देखिए-

वंदेअहं देवं तं श्रीतं रन्तारं कालं भासा य: !

रामों रामाधीराप्यागो लीलामारायोध्ये वासे ! 1

इसका अर्थ यह हुआ कि मैं उऩ श्रीराम के चरणों में प्रणाम करता हूं. जिनके ह्रदय में सीता जी रहती हैं और जिनके लिए राम ने सह्रयाद्रि पर्वत पार कर लंका जाकर रावण का वध किया और वनवास खत्म कर अयोध्या लौटे.

अब इस श्लोक का विलोम इस प्रकार है

सेवाध्येयो रामालाली गोप्याराधी भारामोरा: !

यस्साभालंकारं तारं तं श्रीतं वंदे अहं देवम् !  1

अर्थात

मै रुक्मिणी तथा गोपियों के पूज्य भगवान श्रीकृष्ण के चरणों मे प्रणाम करता हूं, जो सदा ही मां लक्ष्मी के साथ विराजमान है तथा जिनकी शोभा समस्त जवाहरतों की शोभा हर लेती है.

कुछ और श्लोक-

साकेताख्या ज्यायामायासीद्याविप्रादीप्तार्याधारा !

पूराजीतादेवाद्याविश्रासाग्र्यासावाशारावा  !  2

विलोमम्:

वाराशावासाग्र्या साश्र्वाविद्यावादेताजीरापू: !

राधार्यप्ता दीप्राविद्यासीमायाज्याख्याताकेसा ! 2

कामभारस्थलसारश्री सौधासौघनवापिका !

सारसारवपीनासरागाकारसुभूरुभू: ! 3

विलोमम्:

भूरिभूसुरकागारासनापीवरसारसा !

कपिवानघसौधासौ श्रीरसालस्थभामका ! 3