यहाँ आजादी के दीवाने ही नहीं बल्कि पुलिस भी मानी जाती है शहीद, आइए जाने चौरी चौरा काण्ड का पूरा सच!

1922 की 4 फरवरी इतिहास का वो पन्ना है जब आजादी के दीवानों के साथ गुस्से का शिकार हुए पुलिसवाले भी शहीद माने जाते हैं। यह था गोरखपुर का चौरीचौरा काण्ड। अंग्रेजी हुकूमत के समय का यह काण्ड शायद अपने जैसा पहला ही है। पुलिसवालों को अपनी ड्यूटी के लिए शहीद माना जाता है। यह सब इसीलिए क्योंकि, शांति मार्च निकाल रहे सत्याग्रहियों पर पुलिस ने गोलियां चलाई थी।

Chauri chaura
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माना जाता है कि वहाँ फायरिंग हुई थी जिससे गुस्साई भीड़ ने चौरीचौरा थाना फूंक दिया था। इस घटना में लगभग 23 पुलिसवालों की जलकर मौत हो गई थी। आइए जानते हैं इनके नाम। थानेदार गुप्तेश्वर सिंह, उप निरिक्षक सशस्त्र पुलिस बल पृथ्वी पाल सिंह, हेड कांस्टेबल वशीर खां, कपिलदेव सिंह, लखई सिंह, रघुवीर सिंह, विषेशर राम यादव, मुहम्मद अली, हसन खां, गदाबख्श खां, जमा खां, मगरू चौबे, रामबली पाण्डेय, कपिल देव, इन्द्रासन सिंह, रामलखन सिंह, मर्दाना खां, जगदेव सिंह, जगई सिंह, और उस दिन वेतन लेने थाने पर आए चौकीदार बजीर, घिंसई,जथई व कतवारू राम की मौत हुई थी।

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किसे दोषी मान दी गई थी फांसी?

अब्दुल्ला, भगवान, विक्रम, दुदही, काली चरण, लाल मुहम्मद, लौटी, मादेव, मेघू अली, नजर अली, रघुवीर, रामलगन, रामरूप, रूदाली, सहदेव, सम्पत पुत्र मोहन, संपत, श्याम सुंदर व सीताराम को घटना के लिए दोषी मानते हुए फांसी दी गई थी

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गाँधी जी को करना पड़ा अपना आंदोलन स्थगित!

गोरखपुर जिला कांग्रेस कमेटी के उपसभापति प. दशरथ प्रसाद द्विवेदी ने इस घटना की पूरी सूचना गाँधी जी को चिट्ठी में लिखकर दी थी। जिसे हिंसक मानते हुए गाँधी जी ने अपना असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया था।

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