एनकाउंटर पर क्या कहता रहा है मानवाधिकार? विकास दूबे के मामले में दखल देने की मांग

उत्तर प्रदेश पुलिस कई दिनों से सवालों के घेरे में हैं. पहले कानपूर में हुई घटना को लेकर चौबेपुर थाना के पुलिसकर्मी सवालों के घेरे में आये थे. इसके बाद विकास दूबे को गिरफ्तार करने में नाकाम उत्तर प्रदेश पुलिस पर सवाल उठाये गये थे और अब  गिरफ्तारी के बाद विकास दूबे का एनकाउंटर होने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस पर कई सवाल खड़े हो रहे हैं. हालाँकि अब इसी मामले में मानवाधिकार आयोग के दखल की मांग की जा रही है तो आइये जानते हैं कि एनकाउंटर पर क्या कहता है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग?

आपको बता दें कि मार्च 1997 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के तत्कालीन चेयरमैन जस्टिस एम एन वेंकटचलैया ने सभी मुख्यमंत्रियों को लिखा, कमीशन को लगातार ये शिकायतें मिल रही हैं कि फेक एनकाउंटर्स की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं बजाय इसके कि अपराधियों पर कानूनी कार्रवाई की जाये.

वही 1993-94 में भी भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वेंकटचलैया ने कहा कि हमारे कानूनों के अनुसार पुलिस को कोई अधिकार नहीं है कि वो किसी भी शख्स की जान ले और अगर उनके द्वारा ऐसा एक्ट किया जाता है कि पुलिसवालों ने किसी को मार दिया तो इसका मतलब ये हुआ कि उसने खुद कानून को तोड़ा है और ऐसे में उसके खिलाफ हत्या का मामला बनता है या फिर एनकाउंटर के बाद उनको साबित करना होगा कि उनका इरादा हत्या करना नही था.

क्या है राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइन्स ?

वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह निर्देशित किया है कि वह पुलिस एनकाउंटर में हुई मौत के लिए तय नियमों का पालन करे. वो नियम इस प्रकार हैं-
1. जब किसी पुलिस स्टेशन के इंचार्ज को किसी पुलिस एनकाउंटर की जानकारी प्राप्त हो तो वह इसके तुरंत रजिस्टर में दर्ज करे.
2. जैसे ही किसी तरह के एनकाउंटर की सूचना मिले और फिर उस पर किसी तरह की शंका ज़ाहिर की जाए तो उसकी जांच करना ज़रूरी है. जांच दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम या राज्य की सीआईडी के ज़रिए होनी चाहिए.
3. अगर जांच में पुलिस अधिकारी दोषी पाए जाते हैं तो मारे गए लोगों के परिजनों को उचित मुआवज़ा मिलना चाहिए.

एनकाउंटर के बाद पुलिस पर उठाये जा रहे हैं सवाल 

इतना ही नही मई 2010 में NHRC के तत्कालीन कार्यवाहक चेयरमैन जस्टिस जीपी माथुर ने भी इसी बात को दोहराते  दोहराते हुए कहा था कि पुलिस के पास कोई अधिकार नहीं बनता कि वो किसी की जान ले ले. इसी के साथ ये भी कहा गया था कि जब कभी पुलिस पर किसी तरह के ग़ैर-इरादतन हत्या के आरोप लगे, तो उसके ख़िलाफ़ आईपीसी के तहत मामला दर्ज होना चाहिए. घटना में मारे गए लोगों की तीन महीने के भीतर मजिस्ट्रेट जांच होनी चाहिए. इसके साथ ही 48 घंटे में मानवाधिकारी को घटना की रिपोर्ट और तीन महीने के अंदर जांच की भी रिपोर्ट सौंपने की बात कही गयी थी.

ये तो रही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की बात, अब बात करते हैं विकास दूबे के एनकाउंटर की बात. दरअसल उज्जैन से गिरफ्तार किये गये विकास दूबे को जब यूपी पुलिस की एसटीएफ अपने साथ कानपुर लेकर आ रही थी. तो अचानक गाड़ी के पलट जाने के खबर सामने आई. ख़बरों की माने तो घटना स्थल से कुछ दूरी के पहले ही मीडियाकर्मियों की गाड़ी को रोक लिया गया था. इसके कुछ मिनट बाद ही सारा खेल खत्म हो गया.

सवाल तो ये है कि आख़िरकार मीडियाकर्मियों को क्यों रोका गया? आखिरकार इतना खूंखार अपराधी था विकास दूबे तो उसके हाथ खुले क्यों थे? कैसे विकास दूबे एसटीएफ के जवान से पिस्तौल छीन सकता है? ऐसे ना जाने कितने सवाल है जो जिसका जवाब उत्तर प्रदेश पुलिस से पूछे जा रहे हैं.