भाजपा के ब्राह्मण विरोधी होने की खबरों के बीच ‘सपा-बसपा’ ने ब्राह्मणों को रिझाने के लिए चली बड़ी चाल !

उत्तरप्रदेश की राजनीति में अब एक नई लड़ाई शुरु हो गई है. योगी सरकार के कार्यकाल में पुलिस द्वारा चलाए गए एनकाउटंर अभियान के तहत अब तक कई ब्राह्मण मारे जा चुके हैं. इसके बाद उत्तरप्रदेश मे कई बुद्धिजीवी औऱ राजनीतिक दल यह सवाल उठाने लगे हैं कि भाजपा के नेतृत्व वाली योगी सरकार ब्राह्मण विरोधी है. इस मुद्दे को लेकर अखिळ भारतीय ब्राह्मण महासंघ सहित कई ब्राह्मण संगठनों ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि योगी के शासन काल में उत्तरप्रदेश में लगभग 500 ब्राह्मण में मारे गए हैं. इस बीच सपा औऱ बसपा ने ब्राह्मणों को रिझाने के लिए बड़ा दांव खेला है. जहां एक ओर सपा ब्राह्मणों की सहानुभूति बटोरने के लिए राम बनाम परशुराम को अपना हथियार बनाया है तो वहीं बसपा ने मिशन 2022 के तहत ब्राह्मणों के साधने के लिए वर्चुयल संवाद शुरु किया है.

अखिलेश यादव, मायावती और योगी आदित्यनाथ

ब्राह्मण मुद्दे को भुनाने में जुटी राजनीतिक पार्टियां

उत्तरप्रदेश की राजनीति में इस समय काफी उथल-पुथल देखने को मिल रही है. दरअसल उत्तरप्रदेश पुलिस द्वारा खूंखार अपराधी विकास दुबे का एऩकाउंटर किए जाने के बाद ब्राह्मणों में नाराजगी बढ़ी है. इसका सबसे ब़ड़ा कारण है विकास दुबे गैंग के नाम पर अधिकांश अपराधी ब्राह्मण बताए गए और उनका बिना किसी ठोस सबूत के एनकाउंटर कर दिया गया. कई मामलों में तो अपराधी नाबालिक पाया गया साथ ही उसके खिलाफ इससे पहले कोई आपराधिक पुलिस रिकार्ड भी नही था.

इस घटना के बाद उत्तरप्रदेश मे ब्राह्मण अपने आपको उपेक्षित और महत्वहीन महसूस कर रहा है. पिछले हफ्ते राम मंदिर भूमिपूजन ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं को उत्साहित जरुर किया है लेकिन आने वाले समय में ब्राह्मण समुदाय के गुस्से का खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है.

समाजवादी पार्टी ने ब्राह्मणों का मुद्दा उठाया

भाजपा के राममंदिर निर्माण के तहत शुरु किए गए ‘हिंदू पहले’ अभियान को टक्कर देने और भाजपा के खिलाफ ब्राह्मणों में बढ़ती नाराजगी को भुनाने के लिए समाजवादी पार्टी ने राम बनाम परशुराम को जनता के बीच बड़ा मुद्दा बनाया है.

राम औऱ परशुराम युद्ध वास्तव में देखा जाय तो ब्राह्मण और ठाकुर की ल़ड़ाई को दर्शाता है और यह दशकों से उत्तरप्रदेश की राजनीति पर हावी रहा है. राम क्षत्रिय समुदाय से आते हैं जबकि परशुराम ब्राह्मण समुदाय से आते हैं औऱ यह इस समय उत्तरप्रदेश की राजनीति में बिलकुल फिट बैठ रहा है क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ क्षत्रिय समुदाय से आते हैं और ब्राह्मण उनके शासन काल में उपेक्षित महसूस कर रहा है. इसी को देखते हुए समाजवादी पार्टी ने घोषणा की है वह लखनऊ में भगवान परशुराम की 108 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित करेगी. इसके अलावा एक शैक्षिक अनुसंधान केन्द्र और एक भव्य मंदिर बनाया जायेगा.

अखिलेश यादव

सपा नेता अभिषेक मिश्रा ने कहा कि अभी इस परियोजना को अंतिम रुप  दिया जा रहा है. परशुराम चेतना पीठ इस परियोजना की देखरेख करेगा जिसे जनसहयोग से पूरा किया जायेगा. अभिषेक ने कहा कि सपा ब्राह्मण समुदाय से विमुख नही है वह अखिलेश सरकार ही थी जिसने परशुराम जयंती पर अवकाश घोषित किया था जिसे बाद मे योगी सरकार ने रद्द कर दिया था.

बसपा ने ब्राह्मणों को पक्ष मे करने के लिए चलाया वर्चुयल संवाद कार्यक्रम

एक तरफ समाजवादी पार्टी ब्राह्मणों को रिझाने के लिए परशुराम का सहारा ले रही है तो वहीं दूसरी तरफ ब्राह्मणों को अपने पक्ष मे करने के लिए बहुजन समाज पार्टी अब वर्चुयल संवाद कार्यक्रम के तहत उनसे बात करेगी. यही नही सपा के परशुराम अभियान को देखते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती भी पीछे नही है. उन्होंने घोषणा की है कि जब उनकी पार्टी सत्ता में आयेगी तो वह परशुराम की बड़ी मूर्ति स्थापित करायेंगी. मायावती न कहा कि अगर सपा को परशुराम की चिंता थी तो उन्हें सत्ता मे रहते हुए उनकी मूर्ति स्थापित करनी थी.

बसपा ने विधानसभा चुनाव 2007 में दलित-ब्राह्मण गठजोड़ के आधार पर ही सत्ता हासिल की थी और इसे सोशल इंजीनियरिंग कहा था. अब इसी फार्मूले के तहत 2022 में होने जा रहे चुनाव में भी बसपा उसी प्रदर्शन को दोहराना चाहती है. इसके लिए मायावती ने पार्टी के सेक्टर प्रभारियों से ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए उनसे वर्चुयल संवाद तेज करने को कहा है. मायावती अपने मुख्य संगठन में ज्यादातर दलित औऱ पिछड़ों को ही रखती हैं लेकिन इस बार के चुनावी एजेंडें को देखते हुए संगठन का आकार बड़ा किया गया है और इसमें सवर्णों को भी शामिल किया गया है.

मायावती

बता दें कि कांग्रेस ने ब्राह्मण और परशुराम को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक बयान नही दिया है लेकिन पार्टी का एक बड़ा तबका व्हाट्स ऐप के जरिए ब्राह्मणों को अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर रहा है.