केंद्रीय मंत्री किशन रेड्डी ने मैसूर के तानाशाह टीपू को हराने वाले वैकोम पद्मनाभ पिल्लई की प्रतिमा का अनावरण किया

कोट्टायम: संस्कृति मंत्रालय; पर्यटन मंत्रालय; और उत्तर पूर्वी क्षेत्र के विकास मंत्रालय केंद्रीय मंत्री श्री जी किशन रेड्डी ने 26 जून को केरल के गांधी स्मृति भवन, कोट्टायम में वैकोम पद्मनाभ पिल्लई, जिन्हें त्रावणकोर के शेर के रूप में जाना जाता है, की प्रतिमा का अनावरण किया।

अपने सम्बोधन में श्री किशन रेड्डी ने कहा,“वाइकोम पद्मनाभ पिल्लई एक बहादुर सेनानी थे, और उन्होंने राष्ट्रीय दुश्मनों से लड़ने के लिए केरल की पारंपरिक मार्शल आर्ट, कलरिपयट्टु का इस्तेमाल किया। उन्होंने टीपू को हराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ”

केंद्रीय मंत्री ने हमारे स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायकों के जीवन को मनाने और प्रदर्शित करने की आवश्यकता पर जोर दिया और केंद्र सरकार इसे आजादी का अमृत महोत्सव के माध्यम से कैसे मना रही है इसके बारे में भी बताया।

बता दें, वैकोम पद्मनाभ पिल्लई (1767-1809) तत्कालीन त्रावणकोर साम्राज्य की सेना के सेनापति थे। उसने दिसंबर 1789 में नेदुमकोट्टा किलेबंदी में विशाल मैसूर सेना पर घात लगाकर हमला किया। इतिहास के अनुसार, “नेदुमकोट्टा की लड़ाई त्रावणकोर साम्राज्य के इतिहास में सबसे साहसी हमलों में से एक थी, जिसमें मुट्ठी भर लड़ाकों ने एक अच्छी तरह से सुसज्जित दुश्मन सेना में घुसपैठ की थी और सफलतापूर्वक उन्हें भगा दिया था। ” इस हमले में टीपू गंभीर रूप से घायल हो गया था और हमेशा के लिए लंगड़ा हो गया था।

उनकी हार के बाद, मैसूर सेना ने 1790 में किले पर फिर से हमला किया। नेदुमकोट्टा की दूसरी लड़ाई के दौरान, पद्मनाभ पिल्लई और साथी सैनिक कुन्जी कुट्टी पिल्लई ने भूतथनकेट्टू में एक बांध की दीवारों को तोडा जिससे पेरियार नदी में भारी बाढ़ आई जिससे टीपू की सेना को बहुत नुकसान हुआ था। इस सामरिक कदम के परिणामस्वरूप, टीपू की पैदल सेना का एक बड़ा हिस्सा बह गया और सारा गोला-बारूद भीग गया और टीपू को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा।
इस अवसर पर बोलते हुए, प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय संयोजक श्री जे नंदकुमार ने कहा, “यदि वैक्कोम पद्मनाभ पिल्लई नहीं होते, तो त्रावणकोर एक और मालाबार बन जाता, जो एक और हिंदू नरसंहार का मंच होता।”

श्री नंदकुमार ने त्रावणकोर की अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में पद्मनाभ पिल्लई की भूमिका को भी याद किया। “एक महान स्वतंत्रता सेनानी, पद्मनाभ पिल्लई ने वीरा वेलु थम्पी दलवा के साथ 1808 में ब्रिटिश रेजिडेंट कर्नल मैकाले पर हमला किया। वास्तव में, पद्मनाभ पिल्लई ही थे जिन्होंने कर्नल मैकाले के खिलाफ हमले का नेतृत्व किया था। लेकिन, इतिहास ने उन्हें उनका अधिकार सिर्फ इसलिए नहीं दिया क्योंकि उन्होंने टीपू को हराया था। वामपंथी इतिहासकार नहीं चाहते थे कि टीपू पर विजय प्राप्त करने वाले को एक महान स्वतंत्रता सेनानी के रूप में मनाया जाए। ”

मैकाले को मारने के असफल प्रयास के बाद, पद्मनाभ पिल्लई ने अलाप्पुझा के पास पल्लथुरुथी में ब्रिटिश सैनिकों की एक पार्टी पर घात लगाकर हमला किया, जिसमें 13 ब्रिटिश सैनिकों की हत्या कर दी गई थी। मैकाले और ब्रिटिश सैनिकों की हत्या के परिणामस्वरूप उनकी गिरफ्तारी हुई और 1809 में सार्वजनिक रूप से फांसी दी गई।