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आगरा के लालकिले में ठाकुर जी की मूर्ति दबे होने का दावा, वहीं अजमेर शरीफ की दरगाह में एकलिंग शिव मंदिर होने का दावा

उत्तरप्रदेश के मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद में शुक्रवार को उस वक्त नया मोड़ आ गया जब महेंद्र प्रताप नामक एक अधिवक्ता ने मथुरा सिविल कोर्ट में एक नया वाद दायर किया। सिविल जज सीनियर डिवीजन की अदालत में अधिवक्ता द्वारा दायर वाद में दावा किया गया है कि आगरा के लाल किले के अंदर दीवाने खास के पास बेगम साहिबा की मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे टहूकर केशव देव की पौराणिक, अमूल्य व रत्न जड़ित मूर्ति दबी है। वाद में प्रार्थना की गई है कि कोर्ट पुरातत्व विभाग से खुदाई करवाकर मूर्ति को बाहर निकलवाए।

जानकारी अनुसार अधिवक्ता महेंद्र सिंह ने अपनी अर्जी में कहा है कि मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे मूर्ति के दबे होने व उन पर मुस्लिम लोगों के चलने से हिन्दुओं की भावनाएं आहत हो रही हैं। अपने दावे के समर्थन में अधिवक्ता महेंद्र सिंह ने औरंगजेब के मुख्य दरबारी साखी मुस्तेक खान द्वारा लिखित पुस्तक मासर-ए -आलम गिरी का हवाला दिया है। इस वाद के माध्यम से लालकिले में मौजूद बेगम साहिबा की सीढ़ियों का सर्वे कराकर मूर्ति निकलवाने की प्रार्थना की गई है।

इस अर्जी में डायरेक्टर जरनल आर्कियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया, अधीक्षक भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण आगरा, निदेशक भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण व केंद्रीय सचिव को पार्टी बनाया गया है।

वही एक दूसरे प्रकरण में राजस्थान के अजमेर की सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह को लेकर भी एक चौकाने वाला दावा सामने आया है। इस दावे के अनुसार यह दरगाह पृथ्वीराज चौहान द्वारा निर्मित एकलिंग मंदिर पर कब्जा करके बनाई गई है।

दरअसल अजमेर में महाराणा प्रताप सेना ने फेसबुक पोस्ट पर एक फोटो डाला है और इस फोटो को दरगाह का फोटो बताया जा रहा है। साथ ही दावा किया जा रहा है कि खिड़की के एक हिस्से पर स्वास्तिक बना हुआ है। इस पोस्ट के जरिए ये प्रश्न खड़ा करने की कोशिश हो रही है कि अगर ये दरगाह है तो इसके दरवाजों में स्वास्तिक का क्या काम है ?

महाराणा प्रताप सेना के अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को पत्र लिखकर मांग की है कि इस जगह का एएसआई से सर्वे कराया जाए ताकि सच्चाई सामने आ सके।

इस मामले को लेकर महाराणा प्रताप सेना ने ये भी कहा है कि अगर एक सप्ताह के भीतर इस विषय पर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया जाता है तो वो केंद्र सरकार के मंत्रियों से मिलेंगे। इसके अलावा सेना के कई लोग अजमेर जाकर आगे का रास्ता तय करेंगे और बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा। प्रताप सेना का कहना है कि यदि जरुरत पड़ी तो कोर्ट का रास्ता भी चुना जाएगा।