भारत और चीन की तनातनी रोकनी की नई कोशिश, दोनो देशों के बीच हुई सहमती, रोज़ 30% सैनिक बुलाए जाएँगे वापस!

LAC पर कई महीनों से हो रही तनातनी मानो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही है। लेकिन अब भारत और चीन के बीच सहमति बन गई है। बता दें कि दोनों पक्ष पूर्वी लद्दाख के पैंगॉन्ग लेक एरिया से सेना पीछे हटाने पर राजी हो गए हैं। इसका तरीक़ा यह है कि भारत और चीन 3 दिन तक रोज 30% अपने सैनिक वापस बुलाएँगे। तीन फेज में कराई जाएगी सैनिकों की वापसी। समझौते के अनुसार दोनों देशों के सैनिक इस साल अप्रैल-मई में तैनाती वाली पोजिशन पर लौट जाएँगे। 15 जून को गलवान घाटी में सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हो गई थी जिसके बाद दोनों देशों ने अपने हजारों जवान आमने-सामने तैनात कर दिए थे। लेकिन इस झड़प में 20 भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे।

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डिसइंगेजमेंट पर हुई बातचीत!

6 नवंबर को चुशूल में कमांडर लेवल की बातचीत में डिसइंगेजमेंट पर बातचीत हुई थी। विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव नवीन श्रीवास्तव और डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन ब्रिगेडियर घई, भारत की तरफ से बातचीत में शामिल हुए थे।

एक सप्ताह तक चली थी बातचीत!

यह बातचीत एक सप्ताह तक चली जिसमें तय हुआ कि यह मूवमेंट तीन चरणों में पूरा किया जाएगा। इसके मुताबिक, पहले चरण में टैंकों, बख्तरबंद वाहनों और सैनिकों को सीमा से एक तय दूरी पर वापस ले जाना होगा। सहमति के तहत, टैंक और सैनिक एक दिन के अंदर हटाए जाने थे।

क्या है दूसरा स्टेप?

दूसरे स्टेप की बात करे तो, पैंगॉन्ग लेक के नॉर्दर्न बैंक के पास से दोनों पक्षों को 3 दिन तक हर दिन लगभग 30 फीसदी सैनिकों को वापस बुलाना था। जिसके बाद भारतीय सैनिक अपनी एडमिनिस्ट्रेटिव धन सिंह थापा पोस्ट के करीब आ जाएँगे। चीन ने भी फिंगर 8 की अपनी पहले वाली स्थिति में वापस जाने पर सहमति जताई थी।

अंतिम चरण!

तीसरे या कहे अंतिम चरण में दोनों ही पक्षों को पैंगॉन्ग झील एरिया के दक्षिणी तट के साथ चुशूल और रेजांग ला के आसपास ऊँचाई वाले इलाकों में भी अपनी तैनाती वाली जगहें खाली करानी थी। इस कवायद की मॉनिटरिंग के लिए एक साझा मैकेनिज्म बनाया जाएगा। जिसमें आपसी बातचीत के साथ ही निगरानी के लिए अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV) का इस्तेमाल भी शामिल है।

चीन पर भारत का भरोसा हुआ कम!

बता दें कि गलवान घाटी के संघर्ष के बाद अब भारतीय पक्ष इस मुद्दे पर बहुत सावधानी से आगे बढ़ रहा है। चीन पर इस घटना के बाद से भरोसा काफ़ी कम हो गया है। इसी वजह से भारत ने इस एरिया में अपने 60 हजार से ज्यादा सैनिक तैनात कर दिए थे। इसी के साथ ही सर्दियों के मौसम के लिए भी लंबी तैनाती की तैयारी कर ली गई है।

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