राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘सारथी’ माधव सदाशिव राव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी (पुण्यतिथि विशेष)

दुनिया का सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी परिचय का मोहताज नहीं है। विगत 9 दशकों से संघ ने अनेक उतार चढ़ाव देखे हैं। आज भी बिना रुके संघ आगे ही बढ़ता जा रहा है। बल्कि देश के कोने कोने में और समाज के हर वर्ग में अपनी उपस्थिति लगा रहा है। संघ की इतनी लम्बी यात्रा में स्वयंसेवकों की कई पीढ़िया खप गयी हैं। आज 5 जून है और आज का दिन संघ के स्वयंसेवकों के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 5 जून 1973 को संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव राव गोलवलकर (Madhav Sadashivrao Golwalkar) उपाख्य श्री गुरूजी (Shri Guruji) का देहावसान हुआ था। श्री गुरूजी जी पुण्यतिथि पर आईये उनके बारे में संक्षिप्त चिंतन करते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जीवन स्वयं एक मूर्तिमान आदर्श था। उनके अनुकरणीय जीवन से स्वयंसेवकों को अपना जीवन गढ़ने के लिए आवश्यक सही दृष्टिकोण, प्रेरणा और मार्गदर्शन मिला। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार का जब देहावसान हुआ तो संघ की स्थापना को केवल पंद्रह वर्ष हुए थे। उसने राष्ट्रीय प्रांगण में पैर ही रखा था। जिन अनेक पद्धतियों का उन्होंने सूत्रपात किया था वे अभी शैशवावस्था में ही थीं। देश द्वितीय विश्व-युद्ध के चंगुल में फँसा हुआ था।

डॉ. हेडगेवार के देहावसान के बाद सन 1940 में माधव सदाशिव राव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी ने सरसंघचालक का दायित्व संभाला। माधव सदाशिवराव गोलवलकर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण करने और स्वामी अखंडानंद महराज से दीक्षा लेने के उपरान्त संघ के कार्य से जुड़े थे। श्री गुरूजी नाम भी उनको बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने ही दिया था। उनसे पूर्व में बहुत से वरिष्ठ लोग डॉ. हेडगेवार के साथ मिलकर संघ कार्य कर रहे थे। उनमें से किसी को भी संघ का सरसंघचालक न बनाते हुए डॉ. हेडगेवार ने 34 वर्ष के माधव सदाशिवराव गोलवलकर को ये कार्यभार अपने जीते जी सौंप दिया था।

श्री गुरूजी ने सन 1940 से 1973 तक लगभग 33 वर्ष तक दायित्व का निर्वहन करते हुए न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को वैचारिक आधार प्रदान किया बल्कि वास्तव में उन्होंने डॉ. हेडगेवार द्वारा जिस बीज का रोपण किया गया था उसका पालन पोषण का कार्य अपने अंतिम समय तक करते रहे। उन्होंने संघ पर लगे प्रथम प्रतिबंध के कालखंड में संघ के संविधान का निर्माण कराया, देश भर में संघ का विस्तार भी किया। इतना ही नहीं इस दौरान देश विभाजन की विभीषिका, अंग्रेजों से भारत की स्वतंन्त्रता, गाँधी हत्या, भारत पाकिस्तान के बीच तीन-तीन युद्ध (कश्मीर सहित) एवं चीन का भारत पर आक्रमण जैसी ऐतिहासिक घटनाओं के भी साक्षी बने और उस इतिहास निर्माण में समय समय पर हस्तक्षेप भी किया।

श्री गुरूजी वास्तव में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सारथी थे। धर्म के आधार पर हुए देश विभाजन के समय वे पाकिस्तानी हिस्से के उस हिन्दू समाज के सारथी की भूमिका में भी थे। जिसे देश विभाजन से उपजे सांप्रदायिक उन्माद से जूझने के लिए तत्कालीन नेहरू सरकार ने बेबस छोड़ दिया था। देश विभाजन के उस कालखंड में त्रासदी में घिरी जनता के लिए तत्कालीन गृहमंत्री लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा था,”लोगों को अपनी रक्षा स्वयं करनी होगी।”

जब भारत सरकार के गृहमंत्री ने ऐसे शब्द कहे थे उस समय उस निरीह जनता के साथ रक्षक के रूप में श्री गुरूजी और उनका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खड़ा हुआ था। इस बात की पुष्टि विभाजन की विभीषिका में बचे अनेक लोगों ने की। जब हिन्दू और सिक्ख लाहौर आने लगे थे। राहत कार्य मुख्य रूप से संघ द्वारा चलाया जा रहा था। ये लोग कुछ दिनों तक इन कैम्पों में रहते और फिर हरिद्वार, देहरादून तथा दिल्ली जैसे शहरों में अपने रिश्तेदारों के पास चले जाते। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा चलाये जा रहे इन राहत शिविरों ने पंजाब, सिंध, जम्मू कश्मीर और बंगाल के बेघरों, हिंसा का शिकार हुए और लुटे गए भाईयों के लिए रक्षक का काम किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विरोधी आज भी आरोप लगाते हुए ये प्रश्न पूछते रहते हैं कि संघ ने देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में क्या किया था? इस प्रश्न का उत्तर देने में अनेक साक्ष्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं। जिनमें से एक यह भी है कि श्री गुरूजी के कार्यभार संभालने के 2 महीने के बाद ही अंग्रेज सरकार ने एक सर्कुलर जारी किया जिसमें किसी भी संगठन को अंग्रेज सेना के समान वर्दी पहनने और सैन्य प्रशिक्षण देने पर रोक लगायी गयी थी। उस समय केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही एक संगठन था जिसके कार्यकर्ता सेना जैसी वर्दी पहनते थे और ड्रिल्स भी करते थे। अंग्रेजो के इस सर्कुलर का कारण केवल संघ के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकना था। जैसे ही श्रीगुरुजी को इस सर्कुलर के बारे में पता चला उन्होंने तुरंत संघ के गणवेश (ड्रेस) में परिवर्तन कर दिया। अंग्रेजो का सर्कुलर धरा का धरा रह गया।

संघ के विरोधियों के उपरोक्त प्रश्न का उत्तर विस्तृत रूप से 1942 में गाँधी जी के भारत छोडो आंदोलन में संघ ने जो भूमिका निभाई थी, उसके आधार पर भी दिया जा सकता है। संघ को एक संगठन के रूप में किसी आंदोलन में भाग लेना है अथवा नहीं, या केवल स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप में भाग लेना है इसका दिशा निर्देश स्वयं डॉ. हेडगेवार सन 1930 के जंगल सत्याग्रह में भाग लेकर दे चुके थे। तब उन्होंने अपने सरसंघचालक पद से इस्तीफा देकर उस आंदोलन में भाग लिया था और जेल भी गए थे। सन 1942 में श्री गुरूजी के समक्ष यक्ष प्रश्न था – क्या संघ को संगठन के रूप में भारत छोडो आंदोलन में भाग लेना चाहिए अथवा स्वयंसेवकों को व्यक्तिगत रूप से?
आंदोलन की दशा और दिशा का आंकलन करने के लिए श्री गुरूजी ने प्रांत स्तर के कार्यकर्ताओं की एक बैठक बुलाई। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए श्री गुरूजी ने प्रख्यात कृषि विशेषज्ञ, क्रांतिकारी डॉ. पांडुरंगराव खानखोजे (मेक्सिको में प्रख्यात) और उनकी सहायता हेतु संघ के रणनीतिकार बालासाहब देवरस को भूमिगत नेता जयप्रकाश नारायण से भेंट करने के लिए भेजा था। श्री गुरूजी इस आंदोलन में संघ के कूदने से पूर्व खानखोजे के पास भेजे अपने सात प्रश्नों के संतुष्टिजनक उत्तर जयप्रकाश नारायण से चाहते थे। खानखोजे ने जयप्रकाश नारायण के समक्ष जो सात प्रश्न प्रस्तुत किये थे, वे है :
1 . ‘करो या मरो’ वाले आह्वान में ‘मरो ‘का अर्थ तो स्पष्ट है, किन्तु ‘करो ‘ यानी क्या करो? इसके आदेश क्या कांग्रेस कार्यकारणी ने दिए हैं?
2 . आंदोलन का तात्कालिक और दीर्धकालिक उद्देश्य क्या है? यानी अचूकता से क्या साध्य करना है?
3 . आंदोलन की कार्यशैली क्या और कैसे रहने वाली है?
4 . आंदोलन कितने समय तक चलाना है?
5 . अपनी शक्ति का कुछ तो अनुमान लगाया ही होगा वह शक्ति कितनी है?
6 . आंदोलन की सफलता के पश्चात क्या करना है?
7. वह असफल रहा तो आगे क्या करना है?

जयप्रकाश नारायण से भेंट के उपरान्त डॉ. खानखोजे और बाला साहब देवरस वापस आ गए, डॉ. खानखोजे के अनुसार, ” इन महत्वपूर्ण प्रश्नों में से एक का भी संतोषजनक उत्तर श्री जयप्रकाश नारायण ने नहीं दिया।

उपरोक्त 7 प्रश्न श्री गुरूजी की दूरदर्शिता का प्रदर्शन करते हैं। जब जयप्रकाश नारायण जैसी दिग्गज नेता भी इन प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर देने में असमर्थ थे तो इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत छोडो आंदोलन को लेकर कांग्रेस की तैयारी कैसी रही होगी। संघ के नेतृत्व से बात करना तो दूर बल्कि कांग्रेस ने शायद जय प्रकाश नारायण जैसे लोगों से भी कोई चर्चा न की होगी।

इतना ही नहीं, यह तक निश्चित या तय नहीं था कि आंदोलन शुरू करने वाले शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के उपरांत अनुगामी श्रेणी के नेताओं को क्या करना है या नहीं करना है इसके स्पष्ट दिशानिर्देश तक नहीं थे।” इस जानकारी को ध्यान में रखते हुए श्री गुरूजी ने अपने सहयोगियों के साथ विचार-विमर्श किया। वह एक संगठन के रूप में संघ के सामर्थ्य और सीमाओं से अवगत थे। उन्होंने इस आंदोलन की वास्तविक स्थिति का भी पता लगाया था। इस सब के बावजूद, इस आंदोलन के लक्ष्यों संबंधी उनकी कोई दो राय नहीं थी। ऐसी परिस्थितियों में श्री गुरुजी ने निर्णय लिया कि, “ संघ संगठन के रूप में इस आंदोलन में भाग नहीं लेगा, क्योंकि यह आंदोलन देश की स्वतंत्रता के लिए किया जा रहा है, इसलिए नागरिक के रूप में स्वयंसेवक इस आंदोलन में देश के किसी भी स्थान में भाग ले सकते हैं। परन्तु, राष्ट्र के लिए, समाज को संगठित करते हुए और प्रत्यक्ष रूप से बिना आंदोलन में भाग लेते हुए, संघ, संगठन के रूप में अपना कार्य करता रहेगा।”

श्री गुरूजी का भारत छोडो आंदोलन को लेकर जो आंकलन था वह सत्य सिद्ध हुआ। ऐसी ही एक आशंका से विनायक दामोदर सावरकर ने भी गांधी जी को चेताया था,”भारत छोडो आंदोलन का अंत कहीं भारत तोड़ो न हो जाए।” सावरकर की यह भविष्यवाणी 1947 में सत्य सिद्ध हुई जब कांग्रेस और मुस्लिम लीग के कुकर्मों के कारण भारत का विभाजन धर्म के आधार पर हुआ। श्री गुरूजी के नेतृत्व में संघ ने देश हित में अपने सामर्थ्यनुसार हर सम्भव कार्य किया। भारत विभाजन के समय हुए नरसंहार में हिन्दू सिक्ख शरणार्थियों की हर सम्भव मदद करने का कार्य अपने प्राण न्योछावर करके भी किया।

जम्मू कश्मीर के भारत विलय में श्री गुरूजी की भूमिका को भारत कभी नहीं भुला सकता उन्होंने भारत के तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के साथ मिलकर जम्मू कश्मीर के भारत विलय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वर्तमान कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी के निकटतम सहयोगी माने जाने वाले 1966 बैच के आई.ए.एस. अधिकारी और इंडिया: शेडिंग द पास्ट, एंब्रेसिंग द फ्यूचर, 1906-2017’ के लेखक अरुण भटनागर। जिन्होंने सोनिया गांधी द्वारा स्थापित की गई नेशनल एडवाइसरी काउंसिल (N.A.C) का संचालन भी किया था, ने लिखा है कि 17 अक्तूबर 1947 को केंद्रीय गृहमंत्री, सरदार वल्लभ भाई पटेल के कहने पर गुरु गोलवलकर विमान से श्रीनगर पहुंचे, ताकि महाराजा को यह समझा सकें कि जम्मू-कश्मीर की आजादी का खयाल कितना बेतुका है।
महाराजा ने भारत के साथ विलय के समझौते पर हस्ताक्षर करने की इच्छा जताई, जिसकी जानकारी सरदार पटेल को दी गई। हालाँकि अगले कुछ ही दिनों में पाकिस्तान के कबाईलियों द्वारा राज्य पर आक्रमण कर दिए जाने से हालात पूरी तरह से बदल गए। महाराजा हरि सिंह को तत्काल पंडित नेहरू से सैन्य मदद की माँग करनी पड़ी। लेकिन कैबिनेट ने भारतीय सैनिकों को तब तक भेजने से इनकार कर दिया, जब तक कि महाराजा जम्मू-कश्मीर का भारत के साथ विलय नहीं करते। उसकी दलील थी कि भारतीय सेना केवल भारतीय भूभाग की ही रक्षा कर सकती है।

उसी शाम लाल चौक के पास मंगल बाग स्थित डी.ए.वी. कॉलेज में संघ के वरिष्ठ स्वयंसेवकों का पहले से आयोजित सांघिक मिलन कार्यक्रम था, जिसमें 500 से अधिक स्वयंसेवक शामिल हुए। गुरुजी ने वहाँ अपना बौद्धिक (भाषण) संदेश दिया। उन्होंने महाराजा के साथ मुलाकात की कोई चर्चा नहीं की। 19 अक्तूबर को वे दिल्ली लौट गए। गुरुजी दिल्ली में गृहमंत्री सरदार पटेल से मिले और उन्हें महाराजा के सकारात्मक रुख की जानकारी दी। सौभाग्य से मेहरचंद महाजन उस समय तक रामचंद्र काक के स्थान पर प्रधानमंत्री बन गए थे। आखिर में जम्मू-कश्मीर का पूरे देश के साथ विलय हो गया।

श्री गुरूजी अंतिम समय तक डटे रहने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने सन 1943 से 1947 के दौरान कई बार पंजाब और सिंध का दौरा किया। देश विभाजन से ठीक एक सप्ताह पूर्व 7 अगस्त 1947 को वे सिंध दौरे पर थे जबकि तथाकथित महान नेता भागकर सुरक्षित गंतव्यों तक पहुंच गए थे। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि श्री गुरूजी ही कदाचित एकमात्र और अंतिम जननायक थे जिन्होंने आखिरी समय तक अर्थात देश विभाजन से 7 दिन पहले अखंड भारत के सिंध का दौरा किया था। भारत विभाजन हो गया तो संघ ने शरणार्थियों के लिए पुरुषार्थी सहायता समिति, बस्तुहारा सहायता समिति जैसे राहत शिविर खोले। सन 1946 में पंजाब राहत समिति का गठन किया जा चुका था। संघ द्वारा संचालित इन राहत शिविरों ने पंजाब, सिंध, जम्मू कश्मीर और बंगाल के बेघर, हिंसा का शिकार हुए और लूटे गए भाईओं के लिए रक्षक का काम किया। मध्य प्रान्त के हिन्दू रजाकर मुसलमानों की हिंसा से अत्यंत आतंकित थे और सरकार को उनकी चिंता सता रही थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री रवि शंकर शुक्ला और गृहमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्रा ने श्री गुरूजी से सहायता मांगी। उनके निर्देशानुसार संघ ने रजाकार मुसलमानों की हिंसा से हिन्दुओं की रक्षा करने और लोगों में आतंक दूर करने तथा सरकार की क्षमता पर भरोसा रखने हेतु अभियान चलाया था। संघ उस समय हर क्षण रक्षक की भूमिका में खड़ा था।

30 जनवरी 1948 को गांधी जी की दुर्भाग्यपूर्ण हत्या हो गयी और कांग्रेस को संघ का दमन करने का मौका मिल गया। गांधी हत्या के तुंरत बाद सरकार ने संघ पर प्रतिबंध लगा दिया। श्री गुरूजी को धारा 302, 307 और 120 के कठोर आरोपों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। कुछ समय बाद धारा 302 और 120 हटा दिया गया क्योंकि सरकार को अपनी भूल का एहसास हो गया। परन्तु श्रीगुरुजी को 6 महीने बाद जेल से छोड़ा गया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इसके स्वयंसेवकों के प्रयासों से जहाँ नए नए राष्ट्रीय स्तर के संगठनों का प्रादुर्भाव श्री गुरूजी के कार्यकाल में हुआ था। वहीं देश की विशेषकर दिल्ली और पंजाब साधारण जनता तक विविध विषयों पर संघ का दृष्टिकोण पहुँचाने के लिए उस समय संघ ने एक उद्यम और किया था। जिसके अंतर्गत जुलाई 1947 में साप्ताहिक पत्रिका ऑर्गेनाइजर की शुरुआत की गयी। जिसका संपादन ए.आर. नायर, के.आर. मलकानी और एल.के. आडवाणी जैसे प्रभावशाली व्यक्तित्वों ने किया। ऑर्गनाइजर पत्रिका को लेकर संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी ने कहा था,” राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर स्पष्ट, सीधे, निष्पक्ष विचारों के लिए और विशुद्ध देशभक्ति की भावना को आत्मसात करने के लिए, ऑर्गनाइजर पढ़ना उपयोगी है।” वर्तमान समय में इस पत्रिका के भारत के अतिरिक्त अमेरिका, यूके और कनाडा सहित अन्य 54 देशों में लाखों की संख्या में पाठक हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के तुरन्त बाद 14 जनवरी, 1948 को मकर संक्राति के पावन पर्व पर अपने आवरण पृष्ठ पर भगवान श्रीकृष्ण के मुख से शंखनाद के साथ श्री अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में सम्पादक के साथ ‘पाञ्चजन्य’ साप्ताहिक पत्रिका का अनावरण हुआ। संघ पर प्रतिबंध काल में पाञ्चजन्य पर भी आंच आयी। परन्तु प्रतिबंध हटते ही पाञ्चजन्य ने अपना कार्य पुनः शुरू कर दिया। सन 1959 में कम्युनिस्ट चीन द्वारा तिब्बत की स्वाधीनता के अपहरण और दलाई लामा के निष्कासन, सन 1962 में भारत पर चीन के हमले के लिए नेहरू जी की असफल विदेश नीति एवं रक्षा नीति का दोष, सन 1972 में भारतीय सेनाओं की विजय को शिमला समझौते की मेज पर गंवा देने के विरुद्ध पाञ्चजन्य सदा मुखर रहा।
फेक न्यूज़ से प्रभावित वर्तमान काल में इसके लाखों पाठक हैं और पाञ्चजन्य देशभक्ति की भावना से प्रेरित पत्रकारिता का प्रदर्शन कर रहा है। ऐसे ही श्री सी. पी. भिषिकर के सम्पादन में राष्ट्रशक्ति पत्रिका ने कार्य शुरू किया। अटल बिहारी वाजपेयी और सी. पी. भिषिकर दोनों ही संघ के स्वयंसेवक थे। इनके अतिरिक्त लगभग सभी प्रांतों से कोई न कोई प्रकाशन निकलने लगा था। लखनऊ से स्वदेश और दिल्ली से भारतवर्ष का प्रादुर्भाव हुआ, सन 1958 में दादासाहेब आप्टे के नेतृत्व में न्यूज़ एजेंसी हिंदुस्तान समाचार का क्षेत्रीय भाषाओँ में पदार्पण हुआ। अंग्रेजी भाषा में एक एक दैनिक Motherland भी 1970 के दशक में शुरू हुआ था परन्तु आपातकाल में वह बंद हो गया।

श्री गुरूजी के कार्यकाल में जहाँ संघ के कई अनुषांगिक संगठनों की स्थापना हुई इसके अतिरिक्त भारत के बाहर विदेशों में संघ के स्वयंसेवक डॉ. हेडगेवार के वाक्य,’संघ कुछ नहीं करेगा, स्वयंसेवक सब कुछ करेंगे’ को चरितार्थ करने में लग गए। जिसके परिणाम स्वरुप 14 जनवरी 1947 को संघ प्रेरित प्रथम शाखा केन्या में शुरू हुई। जिसका नाम भारतीय स्वयंसेवक संघ (BSS) रखा गया। इसके बाद सन 1950 में म्यंमार के रंगून में BSS की शुरुआत हुई। आगे चलकर अन्य देशों में भी इसकी शाखाएं बढ़ने लगी और बाद में विविध देशों में BSS के कार्यकर्ताओं ने सर्व सहमति से इन सभी शाखाओं को हिन्दू स्वयंसेवक संघ (HSS) के रूप में समाहित कर लिया। वर्ष 1990 में हिन्दू स्वयंसेवक संघ के सभी देशों के प्रतिनिधियों ने बैंगलोर में विश्व संघ शिविर का आयोजन किया।

श्री गुरूजी के कार्यकाल में ही संघ अपने विस्तार के कार्य को गति दी थी, डॉ हेडगेवार द्वारा लगाया गया संघ नामक पौधा अब अपनी शाखाएं अर्थात अनुषांगिक संगठन बनाने में लग गया और इसने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, भारतीय जनसंघ, भारतीय मजदूर संघ, किसान संघ,सरस्वती शिशु मंदिर, और विश्व हिन्दू परिषद जैसे कई संगठनों का प्रादुर्भाव किया। आज ये सभी संगठन अपने अपने क्षेत्र के अग्रणी संगठन हैं और अपने लाखों की संख्या में कार्यकर्ताओं के साथ भारत को विश्वगुरु के पद तक पुनः पहुंचाने में कार्यरत हैं।
पांचजन्य और ऑर्गनाइजर जैसी संघ समर्थित पत्रिकाएं आज लाखों पाठकों तक पहुंच रही हैं। 5 जून सन 1973 को श्रीगुरुजी का देहावसान हुआ, परन्तु तब तक वे संघ को विश्व पटल पर और देश के हर क्षेत्र के केंद्र बिंदु में लाकर खड़ा कर चुके थे। आज भी संघ के स्वयंसेवक श्री गुरूजी के वाक्य,” मैं नहीं, तू ही” को अक्षरसः सार्थक करते हुए संघ मार्ग पर चल रहे हैं।

पुस्तक संदर्भ

हमारे श्रीगुरुजी, संदीप देव, 2017,प्रभात प्रकाशन, दिल्ली
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: परत दर परत, रतन शारदा, 2020, ब्लूम्सबरी, दिल्ली