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तो इसलिए ऋषि दुर्वासा ने इन्द्र को लक्ष्मीहीन होने का श्राप दे दिया था.. जानिए रोचक कथा !

भारतीयता और यहां की संस्कृति इतनी रोचक है कि अगर आप इसको जानने लगेंगे तो डूबते जायेंगे. भारतीय धार्मिक साहित्य में देवी-देवताओं और ग्रंथों की ही तरह फूलों का भी महत्व है. दरअसल फूलों की शक्ति हमें दिखाई नही देती लेकन फूलों में देवीय शक्तियां विद्यामान होती हैं. इसीलिए पूजा करते समय खास तरह के फूल खास देवता को ही चढ़ाये जाते हैं. गलती से भी किसी ने भगवान को चढ़ाये जाने फूल का अनादर कर दिया तो उसे मां लक्ष्मी के क्रोध का शिकार होना पड़ता है. कहा जाता है कि एक बार इन्द्र ने अंहकार में आकर वैजयंती का अपमान कर दिया जिसके परिणामस्वरुप महालक्ष्मी उनसे नाराज हो गई और इन्द्र को दर-दर भटकना पड़ा.

महर्षि दुर्वासा

जब इन्द्र ने वैजयंतीमाला का कर दिया था अपमान

देवराज इन्द्र एक बार अपनी सवारी ऐरावत से नगर भ्रमण को निकले. रास्ते में भ्रमण करते हुए उन्हें ऋषि दुर्वासा मिल गए. महर्षि दुर्वासा देवराज इन्द्र को सामने पाकर अपने गले की माला उतार कर उन्हें पहना दिया लेकिन इन्द्र अपने गले से वैजयंतीमाला को उतार कर अपनी सवारी ऐरावत को पहना दिया. ऐरावत भी उसे अपने गले से उतार कर पैरों तले रौंद दिया. महर्षि दुर्वासा को इससे बहुत गुस्सा आया और उन्होंने इन्द्र को लक्ष्मीविहीन होने का श्राप दे दिया.

राजा बलि से युद्ध में हार गये इन्द्र

समय के साथ देवराज इन्द्र को श्राप लगा और वह राजा बलि के साथ एक युद्ध में हार गए. युद्ध मे हार के बाद तीनों लोकों में राजा बलि का अधिकार हो गया. इन्द्र दर-दर भटकने को मजबूर हो गए तब हताश औऱ निराश देवता ब्रह्माजी को साथ लेकर श्रीहरि के पास कोई युक्ति सुझाने और अपना स्वर्गलोक वापस पाने के लिए प्रर्थाना करने लगे.

श्रीहरि देवताओं की प्रार्थना सुन बोले आप सब दैत्यों से सुलह कर लें और उनके साथ जाकर मंदराचल पर्वत को उठा लाए. मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन करें, उससे जो अमृत निकलेगा उसे मैं सभी देवताओं को पिला कर अजर-अमर कर दूंगा. दैत्यों का विनाश हो जायेगा और देवताओं को स्वर्ग वापस मिल जायेगा.

दैत्यों के साथ मिलकर मंदराचल पर्वत उठा लाये देवता

इन्द्र दैत्यों के राजा बलि के पास गए और उनसे क्षीरसागर मंथन की बात कर मंदराचल पर्वत को उठाने की मदद मांगी. दैत्यराज बलि अमृत के लालच मे आकर मंदराचल को उठाने की बात मान गए.

देवताओं के साथ मिलकर दैत्यों ने अपनी पूरी शक्ति लगाकर मंदराचल पर्वत को उठाने लगे लेकिन वह नही उठा सके. तब सभी ने मिलकर हरि का ध्यान किया. भक्तों की पुकार पर श्रीहरि दौड़े चले आए उनकी मदद से मंदराचल को गरुड़ में स्थापित कर क्षीरसागर के तट पर पहुंचा दिया गया. मंदराचल को मथानी और वासुकि को रस्सी बनाकर समुद्र मंथन का कार्य आरंभ किया गया लेकिन श्रीहरि ने देखा कि मंथानी अंदर धंसी जा रही है तब उन्होंने कच्छप का रुप धारण कर स्वयं मंदराचल को अपने ऊपर रख लिया.

शास्त्रों के अनुसार समुद्र मंथन में सबसे पहले विष निकला जिसकी लपटों से सभी प्राणी संकट में पड़ गए. तब भगवान शिव प्रकट हुए औऱ इस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया तभी से वह नीलकंठ कहलाने लगे.

समुद्र मंथन से निकले कई रत्न

समुद्र मंथन से विष के अलावा और कई रत्न निकले जिसमें लक्ष्मी, कौस्तुभ, सुरा, पारिजात, धंन्वतरि, पुष्पक, चन्द्रमा, ऐरावत, शंख, रम्भा, कामधेनु और अंत मे अमृत कुंभ निकला जिसे लेकर धन्वंतरि आए लेकिन उनके हाथ से अमृत कलश छीनकर दैत्य भागने लगे. वह देवाताओं से पहले वह अमृत पीकर अजर-अमर होना चाह रहे थे. हालांकि दैत्य आपस मे ही अमृत के लिए झगड़ने लगे.

समुद्र मंथन

यह देख श्रीहरि नारी का सुंदर रुप धारण कर दैत्यों के बीच आ गए और अमृत कलश की मांग करने लगे. श्रीहरि के नारी रुप पर मोहित होकर दानवो ने अमृत कलश उन्हें दे दिया. श्रीहरि ने दैत्यों से यह भी वचन ले लिया कि मैं जैसा भी विभाजन करुं चाहे वह उचित हो या अनुचित दैत्य लोग इसमें बाधा उत्पन्न नही करेंगे. सभी राक्षसों ने उनकी बात मान ली.

अमृतपान करने के लिए सभी देवता और दैत्य अलग-अलग पंक्तियों में बैठ गए. मोहिनी नारी का रुप धारण कर श्रीहरि ने सारा अमृत देवताओं को ही पिला दिया जिससे देवता अमर हो गए औऱ राक्षसों का विनाश होते ही उन्हें स्वर्ग लोक वापस मिल गया.