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आखिर क्यों 40 साल बाद भी नहीं बन पाई है HIV की वैक्सीन? कारण पढ़ कर आप भी हो जाएंगे हैरान

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कोरोना एकमात्र ऐसी बीमारी नहीं है जिसकी अभी तक कोई वैक्सीन नहीं है बल्कि HIV AIDS भी उन खतरनाक बीमारियों में से एक हैं जिसकी आज तक कोई वैक्सीन नहीं बन सकी है। डॉक्टर्स के अनुसार एंटी रेट्रोवायरल थेरपी और दवाओं के जरिए एड्स के प्रभाव को कम तो किया जा सकता है लेकिन अगर एक बार आप इससे संक्रमित हो जाएं तो फिर एड्स को जड़ से खत्म करना संभव नहीं है क्योंकि अभी तक इसके लिए कोई दवा यह वैक्सीन नहीं है।

बता दें वैज्ञानिकों को पहली बार 1980 में इस बीमारी के बारे में पता चला था और साल 1984 में अमेरिका के हेल्थ एंड ह्यूमन सर्विस विभाग ने दावा किया था कि दो साल के भीतर इसकी वैक्सीन तैयार कर लेंगे लेकिन 36 साल बीत जाने के बाद भी कोई सफलता हांथ नहीं लगी है। आज World Aids Day के अवसर पर The National Opinion आपको बता रहा है कि HIV AIDS की वैक्सीन बनाने में वैज्ञानिकों के सामने कौन सी बड़ी चुनौतियां आ रही है।

1 – HIV और इम्यून

विशेषज्ञों के अनुसार रोगी के शरीर में रोगों से लड़ने वाला इम्यून सिस्टम HIV (Human immunodeficiency virus) वायरस के खिलाफ इम्यून एंटीबॉडी बनता तो है लेकिन वो सिर्फ रोग की गति को धीमा करती है, उसे रोक नहीं पाती जो अपने आप में एक बड़ा चैलेंज है।

2 –  इम्यून नहीं कार्य अच्छे से प्रतिक्रिया

HIV के संपर्क में आने के बाद मरीज का इससे रिकवर होना लगभग असंभव है क्योंकि HIV पर इम्यून का कोई रिएक्शन नहीं होता जिसके कारण वैज्ञानिक वैक्सीन नहीं बना सकते जो शरीर में एंटीबॉडी के प्रोड्यूस होने की नकल कर सके।

3 – रूप बदलने में माहिर होता है HIV

बता दें HIV वायरस बड़ी तेजी से रूप बदलता है, जबकि वैक्सीन किसी भी वायरस के एक विशेष रूप पर हो प्रभावी होती है एवं उसे एक ही वायरस को टारगेट करके बनाया जा सकता है। HIV वायरस के रूप बदलते ही उस पर वैक्सीन का असर काम करना बंद कर देता है।

4 – DNA में छिप जाता है HIV

यह बात गौर करने वाली है कि शरीर में एचआईवी संक्रमण फैलने में एक लंबी अवधि लगती है। इस दौरान वायरस इंसान के DNA में छिपकर रहता है और ऐसे में हमारे शरीर के लिए DNA में छिपे वायरस को खोजकर उसे नष्ट करना काफी मुश्किल काम हो जाता है।

5 – वायरस की प्रकृति है बिल्कुल अलग

बता दें ज्यादातर वैक्सीन ऐसे वायरस से इंसान की सुरक्षा करती है जो रेस्पिरेटरी और गैस्ट्रो-इंटसटाइनल सिस्टम से इंसान के शरीर में दाखिल होते हैं जैसे कोरोना, जबकि HIV का संक्रमण जननांग या खून के जरिए शरीर में फैलता है।

6 – नष्ट हो चुके वायरस नहीं करते काम

समझने वाली बात यह है कि वैक्सीन बनाने में ज्यादातर कमजोर या नष्ट हो चुके वायरस का ही इस्तेमाल होता है, लेकिन एचआईवी के मामले में नष्ट हो चुका वायरस शरीर में इम्यून को सही ढंग से रिस्पॉन्स नहीं कर पाता है और इस वायरस के किसी भी जीवित रूप का इस्तेमाल अपने आप में बेहद खतरनाक है।

7 – जानवरों का नहीं है कोई मॉडल

बता दें कि जानवरों पर टेस्ट करने के बाद ही किसी वैक्सीन को इंसान के लिए तैयार किया जाता है, लेकिन दुर्भाग्यवश HIV के लिए जानवरों का एक भी ऐसा मॉडल नहीं है जिसकी तर्ज पर इंसानों के लिए एड्स  की वैक्सीन तैयार की जा सके।