मायावी रावण ने रचे थे हिन्दू धर्म के यह 13 अद्भुत ग्रंथ !

कुबेर और रावण दोनों ही ऋषि विश्रवा के पुत्र थे. दोनों ही सौतेले थे इसलिए दोनों के आचार-विचार में काफी विभिन्नता थी. रावण था तो अहंकारी लेकिन शास्त्रों-पुराणों मे इतना पारंगत था कि बड़े बडे ज्ञानी उसका लोहा मानते थे. रावण को महापंडित माना जाता है. वह ज्ञानी होने के साथ ही ज्योतिष, वास्तु और विज्ञान में भी उतना ही निपुण था. रावण को उस युग का प्रकाण्ड विद्वान और वैज्ञानिक भी माना जाता है. उसके पास असीम ज्ञान था जिसके बल पर उसने 13 अद्भुत ग्रंथों की रचना की तो आइए जानते हैं कि कौन से ग्रंथ है वह.

रावण द्वारा रचित 13 ग्रंथ

रावण के बारे में कहा जाता है कि वह चारों वेंदो का ज्ञाता था. संस्कृत का प्रकाण्ड ज्ञाता होने के साथ-साथ वह वास्तुकार, शिल्पकार, आयुर्वेद का महान ज्ञानी, संज्ञीतग, राजनीतिज्ञ औऱ भगवान शिव का अनन्य भक्त भी था. उसने जिन ग्रंथो की रचना की वह इस प्रकार हैं.

1 शिव तांडव स्त्रोत

हिन्दू धर्म के अनुसार रावण ने अंहकार में कैलाश पर्वत को ही उठा कर श्रीलंका की ओर चल दिया था. उसके इस अहंकार को दूर करने के लिए भगवान शिव ने अपने अंगूठे को जरा सा दबाया जिससे रावण का हाथ पहाड़ के नीचे दब गया. उसके बाद रावण के लाख कोशिश के बाद भी कैलाश पर्वत अपनी जगह से टस से मस नही हुआ. रावण को अपनी भूल पर पश्चाताप हुआ और शिव तांडव स्त्रोत से भगवान शिव को प्रसन्न करने की ठानी जो बाद मे शिव ताडंव स्त्रोत कहलाया.

2 रावण संहिता

रावण संहिता में उसके जीवन के हर पहलू की जानकारी मिलती है साथ ही इसमें ज्योतिष की बेहतर जानकारियां भी उपलब्ध हैं.

3 अरुण संहिता

अरूण संहिता के संस्कृत मूल ग्रंथ का कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. इसमें जन्म कुंडली, हस्त रेखा तथा सामुद्रिक शास्त्र का विश्लेषण है.

4 दस शतकात्मक अर्कप्रकाश

5 दस पटलात्मक

6 उड्डीशतंत्र

7 कुमारतंत्र

8 नाड़ी परीक्षा

यह सभी चिकित्सा और तंत्र-मंत्र के क्षेत्र में बहु-चर्चित ग्रंथ हैं

9 अंक प्रकाश

10 इंद्रजाल

11 प्राकृत कामधेनु

12 प्राकृत लंकेश्वर

13 रावणीयम्

रावण की बुराई यह थी कि वह अपने से बड़ा किसी को नही मानता था. वह सोचता था कि वह जो चाहे कर सकता है उसकी इसी बुराई के के कारण उसके सारे ज्ञान दब गए. अपनी आसुरी प्रावृत्ति के कारण वह गौ-ब्राह्मणों और यहां तक की देवी देवाताओ को भी परेशान करने लगा.

कौन था रावण

रावण ऋषि विश्रवा का पुत्र था. पौराणिक ग्रंथो की मानें तो ऋषि पुलत्स्य जगत पिता ब्रह्मा के पुत्र थे. उनके पुत्र विश्रवा थे जिनकी पहली पत्नी जो कि ऋषि भारद्वाज की पुत्री थी, से कुबेर का जन्म हुआ जबकि दूसरी पत्नी राक्षस राज सुमाली के बेटी कैकसी का पुत्र रावण था. जैन धर्म के ग्रंथों के अनुसार दशानन को प्रति-नारायण कहा गया है और उनकी गिनती जैन धर्म के 64 शलाका पुरूषों में होती है.

रावण के कई गुण थे. आज भी भारत में कई स्थानों पर रावण दहन नही होता औऱ उसकी पूजा भी की जाती है. रावण न केवल हिन्दू धर्म के ग्रंथ वाल्मीकी रामायण बल्कि अन्य ग्रंथ पद्मपुराण, श्रीमद्भागवत पुराण, महाभारत, कूर्मपुराण, आनंद रामायण और दशावतारचरित में भी पढ़ने को मिलता है. सबसे बड़ी बात तो यह है कि जैन धर्म ग्रंथों में भी रावण का विस्तार से वर्णन है.