तो क्या वसुंधरा राजे की खामोशी से बच गई गहलोत सरकार !

पिछले कुछ दिनों से राजस्थान में सियासी रस्साकसी का दौर चल रहा है. इस रस्सा कसी में बड़े से बड़े नेता औऱ छुटभैया तक अपनी किस्मत आजमाने की कोशिश में हैं लेकिन राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने बयान देना तो दूर एक ट्वीट तक नही किया. कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार गिरने की कगार पर है लेकिन राजस्थान बीजेपी की बड़ी नेता चुप हो यब बात किसी को हजम नही हो रही है. माना जा रहा की वंसुधरा राजे सिंधिया के कारण ही बीजेपी बैकफुट पर आ गई. अगर वह इस मुद्दे पर आगे आई होती तो इस समय राजस्थान का सियासी नजारा कुछ और होता.

वसुंधरा राजे सिंधिया

वंसुधरा राजे की खामोशी ने बचा ली गहलोत सरकार

वंसुधरा राजे को राजस्थान बीजेपी का बड़ा नेता माना जाता है लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में उनको अपना कोई रोल नजर नही आ रहा है. राजस्थान में बीजेपी के 75 विधायक हैं जिसमें से 45 विधायक वसुंधरा गुट के माने जाते हैं बावजूद इसके की उन्होंने अभी तक कोई बयान जारी नही किया है. यहां तक की इस दौरान वंसुधरा राजे अपने धौलपुर हाउस में ही रही न तो वह दिल्ली गई और ना ही जयपुर आई.

इसकी एक वजह वंसुधरा राजे सिधिंया की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से नजदीकियां बताई जा रही है. तो दूसरी वजह बीजेपी से वह बहुत दिनों से किनारे चल रही हैं उनको इस समय अपना कोई भविष्य नजर नही आ रहा है. शायद यही कारण है कि वसुंधरा राजे इस समय हो रहे राजनीतिक घटनाक्रम से दूरी बनाए हुए हैं.

वंसुधरा की गहलोत से नजदीकियां

वसुंधरा राजे सिंधिया और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बीच काफी अच्छे संबंध हैं. उनकी नजदीकियों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि हाईकार्ट ने वसुंधरा राजे को सरकारी बंगला खाली करने का आदेश दिया था बावजूद इसके गहलोत ने राजे से बंगला खाली नहीं करवाया और न ही नोटिस दिया. जबकि किरोड़ीलाल मीणा और कांग्रेस नेता पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाड़िया से कोर्ट के आदेश का पालन करवाते हुए बंगला खाली करवा लिया गया था.

सचिन पायलट के मुद्दे पर एक ओर जहां वसुंधरा राजे सिंधिया चुप्पी साधे हुए हैं तो वहीं गजेन्द्र सिंह शेखावत मुखर होकर अपनी बात रख रहे हैं. गजेन्द्र सिंह शेखावत औऱ वंसुधरा राजे सिधिंया के बीच मतभेद जगजाहिर है. माना जाता है कि गजेन्द्र सिंह शेखावत को राजस्थान बीजेपी का अध्यक्ष बनाया जा रहा था तो वंसुधरा राजे ने ही केन्द्रीय नेतृत्व से उनको नही बनाने को लेकर अड़ गई थी. काफी कोशिशों के बाद भी वसुंधरा नही मानी. बाद मे सतीश पूनिया को राजस्थान बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया.

राजे को अपना फायदा कम बीजेपी का ज्यादा दिख रहा था

वसुंधरा राजे की खामोशी का दूसरा कारण उनका अपना कोई फायदा नही दिख रहा है. वह पिछले लंबे समय से बीजेपी नेतृत्व से किनारे चल रही हैं. अगर सरकार टूटने की स्थिति में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनता तो पार्टी गजेन्द्र सिंह शेखावत या फिर किसी युवा चेहरे को प्राथमिकता देती. दूसरा अगर सचिन पायलट मुख्यमंत्री बनते तो भी वंसुधरा राजे को कुछ मिलने वाला नही था. यहां तक कि उनको अगले चुनाव में भी मुख्यमंत्री जैसा पद नही दिख रहा था. शायद यही कारण था कि वह इस रस्साकसी में दूर ही रही. हालांकि इससे बीजेपी को बड़ा नुकसान हुआ है. पार्टी ने सरकार बनाने का एक ब़ड़ा मौका गवां दिया.