‘पीएफआई सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा’: केंद्र ने पीएफआई को ‘गैरकानूनी’ घोषित किया, इसे और इसके सहयोगियों को किया 5 साल के लिए प्रतिबंधित

केंद्र सरकार ने आतंकी गतिविधियों में शामिल कुख्यात संगठन पीएफआई को गैरकानूनी संस्था घोषित करते हुए उस पर पांच साल की अवधि के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। केवल इतना ही नहीं केंद्र सरकार ने पीएफआई और उससे जुड़े सहयोगी संगठनों को भी गैरकानूनी संगठन घोषित कर पांच साल का प्रतिबंध लगाया है। केंद्र सरकार के इस फैसले को तत्काल प्रभाव से लागू किया गया है। बता दें, सरकार ने यह कदम टेरर फंडिंग मामलों में पीएफआई नेताओं पर दो दौर के बड़े पैमाने पर देशव्यापी छापेमारी के बाद उठाया है।

इस संबंध में केंद्र सरकार ने कहा है कि पीएफआई कई आपराधिक आतंकी मामलों में शामिल रहा है जो कि देश के संविधान प्राधिकार का अनादर करता है। केंद्र सरकार ने कहा कई मामलों में यह स्पष्ट हुआ कि इसके काडर बार-बार हिंसक और विध्वंसक कार्यों में शामिल हो रहे हैं। इसके साथ ही पीएफआई के कई संस्थापक सदस्य सिमी के नेता रहे हैं और पीएफआई का संबंध जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश से भी रहा है। ये दोनों संगठन प्रतिबंधित संगठन है।

पीएफआई के देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होने की आशंकाओं के चलते पिछले कई दिनों से सरकारी एजेंसियों ने संस्था पर नकेल कसी हुई है। प्रवर्तन निदेशालय और राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने देशभर में संस्था के तमाम ठिकानों पर छापे मारे। इसको लेकर बड़े स्तर पर विरोध भी देखने को मिला। मंगलवार को भी सरकार की पीएफआई के खिलाफ कार्रवाई जारी रही।

मंगलवार, 27 सितंबर को सात राज्यों में स्थानीय पुलिस और आतंकरोधी दस्ते ने पीएफआई से जुड़े ठिकानों पर छापा मारा और इससे जुड़े 170 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया। पूछताछ के बाद इनमें से कई को गिरफ्तार भी किया गया है। इससे पहले गुरुवार को एनआई के नेतृत्व में 15 राज्यों में 93 स्थानों पर छापेमारी हुई थी।

पीएफआई के खिलाफ पिछले गुरुवार से शुरू इन छापों में जांच एजेंसियों को अहम सबूत हाथ लगे हैं। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, दिल्ली, महाराष्ट्र, असम और मध्य प्रदेश में स्थानीय पुलिस और आतंकरोधी दस्ते ने सोमवार-मंगलवार आधीरात को एक साथ छापे मारे। इस कार्रवाई में सबसे अधिक 75 लोगों को कर्नाटक से हिरासत में लिया गया।

एनआईए के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक छापों में मिले साक्ष्यों के आधार पर राज्य पुलिस अलग-अलग एफआईआर दर्ज करेंगी। एनआईए ने इस मामले में पांच नए केस दर्ज किए हैं। एनआईए पहले से पीएफआई के खिलाफ 14 मामलों की जांच कर रही है और 355 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर चुकी है। ईडी ने पीएफआई के खिलाफ मनी लांड्रिंग के दो नए केस दर्ज किए हैं और दो केस की पहले से जांच कर रही है।

बताना चाहेंगे कि दिल्ली-यूपी से लेकर देश के अलग-अलग ठिकानों पर ताबड़तोड़ एक्शन के बाद केंद्र सरकार ने यूएपीए के तहत इस संगठन को गैरकानूनी घोषित कर दिया है। पीएफआई के सहयोगी संगठनों में जिन पर प्रतिबंध लगाया गया है उनमें रिहैब इंडिया फाउंडेशन (आरआईएफ), कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई), ऑल इंडिया इमाम काउंसिल (एआईआईसी), नेशनल कंफेडरेशन ऑफ ह्यूमन राइट ऑर्गेनाइजेशन (एनसीएचआरओ), नेशनल वूमंस फ्रंट, जूनियर फ्रंट, एम्पावर इंडिया फाउंडेशन और रिहैब फाउंडेशन, केरल भी शामिल हैं। इसी के साथ अब भारत में राष्ट्रव्यापी प्रतिबंधित करीब 43 संगठन हैं। पीएफआई मनी लॉन्डरिंग और बाहर से वैचारिक समर्थन प्राप्त करने के साथ देश के अधिकारों और देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए यह एक बड़ा खतरा बन गया है।

पीएफआई का गठन 2006 में हुआ था। यह संगठन दक्षिण भारत के तीन मुस्लिम संगठनों का विलय करके बना था और ये तीनों संगठन 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के पश्चात बने थे। इनमें केरल का नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु का मनिथा नीति पसराई शामिल थे। जांच एजेंसियों का छापेमारी का सिलसिला शुरू होने पर यह बात सामने आई थी कि देश के 23 राज्यों में पीएफआई संगठन सक्रिय है।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि देश में स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट यानि सिमी पर बैन लगने के बाद पीएफआई का विस्तार तेजी से हुआ। कर्नाटक, केरल जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में इस संगठन की काफी पकड़ बताई जाती है। केवल इतना ही नहीं इसकी कई शाखाएं भी हैं। गठन के बाद से ही पीएफआई पर समाज विरोधी और देश विरोधी गतिविधियां करने के आरोप लगते रहे हैं, जबकि पीएफआई खुद को अल्पसंख्यकों को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध एक नव-सामाजिक आंदोलन के रूप में वर्णित करता रहा है जो समाज में इस समुदाय, दलित और समाज के अन्य कमजोर वर्ग के लिए कार्य करता है।

दरअसल, 1977 से देश में सक्रिय सिमी पर 2006 में प्रतिबंध लगा गया था। सिमी पर प्रतिबंध लगने के चंद महीनों बाद ही पीएफआई अस्तित्व में आया। उसके बाद इस संगठन की एक्टीविटीज में तेजी आ गई और देखते ही देखते इसका विस्तार भी तेजी से होने लगा। इस संगठन की एक्टिविटीज को लेकर साल 2012 से ही अलग-अलग मौकों पर पीएफआई पर कई तरह के आरोप भी लगते रहे हैं।

पीएफआई एक कट्टरपंथी संगठन है। 2017 में पीएफआई ने गृह मंत्रालय को पत्र लिखकर इस संगठन पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी। NIA जांच में इस संगठन के कथित रूप से हिंसक और आतंकी गतिविधियों में लिप्त होने के बात आई थी। पीएफआई के डोजियर के मुताबिक यह संगठन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। यह संगठन मुस्लिमों पर धार्मिक कट्टरता थोपने और जबरन धर्मांतरण कराने का काम करता है।

वहीं साल 2012 में कांग्रेस के ओमन चांडी के नेतृत्व वाली केरल सरकार ने उच्च न्यायालय को सूचित किया था कि पीएफआई “प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के पुनरुत्थान के अलावा और कुछ नहीं” है। केवल इतना ही नहीं यह बात एक सरकारी हलफनामे में भी कही गई है कि पीएफआई कार्यकर्ताओं पर हत्या के 27 मामले में दर्ज हैं।