चीन के दबाव में नेपाल ‘गोरखा रेजीमेंट’ खत्म करने की कोशिश में तो है लेकिन इसमें उसी का अहित छुपा हुआ है,

पिछले कुछ दिनों में चीन और नेपाल की बीच काफी नजदीकियां बढ़ी हैं. हालांकि अभी भी नेपाल के नागरिक भारत की सीमा की हिफाजत में डटे हुए हैं. नेपाल औऱ भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत लगभग सामान है. आज भी भारत और नेपाल में एक-दूसरे के यहां आने जाने में कोई वीजा य़ा पासपोर्ट नही लगता. लेकिन 70 वर्षों को यह दृढ़ संबंध अब टूटता हुआ नजर आ रहा है. दरअसल नेपाल भारतीय सेना के गोरखा रेजीमेंट को समाप्त करने का संशोधन देश के सामने पेश करने जा रहा है. बता दें कि भारतीय सेना में गोरखा रेजीमेंट का खास महत्व है. यह अपनी बहादुरी और शौर्य के लिए दुनिया भर में जानी जाती है.

गोरखा सैनिक

गोरखा रेजीमेंट खत्म करने की कोशिश में नेपाल

भारत और नेपाल की बीच रिश्तों की गौरवपूर्ण गाथा रही है लेकिन अब चीन के दबाव में आकर नेपाली सरकार बड़ा निर्णय लेने जा रही है. नेपाल ने कहा है कि गोरखा रेजीमेंट मे भर्ती अतीत की विरासत है और वर्तमान संदर्भ में इसका कोई औचित्य नही रहा गया है. नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ग्यावली ने भारत और ब्रिटेन से अपने त्रिपक्षीय समझौते में संशोधन का आह्रान किया है. ग्यावली ने दावा किया है कि यह समझौता आज के परिदृश्य मे निर्ऱथक हो गया है.

नेपाली विदेश मंत्री के इस वक्तव्य के बाद भारतीय सेना के गोऱखा रेजीमेंट पर अस्तित्व का खतरा मंडराने लगा है. ग्यावली ने कहा- ‘गोरखा भर्ती अतीत की विरासत है. इसके विभिन्न पहलू हैं. इसने नेपाली युवाओ को विदेश जाने की खिड़की खोल दी. समाज में बहुत सारी नौकरियां पैदा की लेकिन वर्तमान संदर्भ में समझौते में कुछ प्रावधान है. इसलिए इसके आपत्तिजनक पहलुओं पर चर्चा शुरु करनी चाहिए.’

भारत में स्थित गोरखा रेजीमेंट का क्या है नेपाल से संबंध

भारतीय सेना में शामिल गोरखा रेजीमेंट दुनिया की सबसे खूंखार और बेहतरीन फौज में से एक मानी जाती है. इस बटालियन की स्थापना हिमाचल प्रदेश के सुबाथू में ब्रिटिश सरकार ने 24 अप्रैल 1815 में की थी. इसे अब 1/3  गोरखा राइफल्स के नाम से जाना जाता है. भारतीय सेना के इस महत्पूर्ण सैन्य दल मे 70 फीसदी गोरखा मूल के नेपाली नागरिक होते हैं. इस रेजीमेंट का गठन ब्रिटिश भारतीय सेना के रुप में 1815 में किया गया था लेकिन 1947 में भारत के आजाद होने के बाद इसे भारतीय सेना को हस्तांतरित कर दिया गया. भारत की ही तरह ब्रिटेन में भी गोरखा रेजीमेंट कार्यरत है जिसमें नेपाली मूल के नागरिक भर्ती होते हैं.

चीन के दबाव में रेजीमेंट को खत्म करने की कोशिश

राष्ट्रपति जिनपिंग की अगुवाई वाली चीनी नेतृत्व भले ही इज समय नेपाली प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली से खूब नजदीकियां बढ़ा रहा हो लेकिन इसके दूरगामी औऱ गंभीर परिणाम होने वाले हैं. चीन का तानाशाही रवैया किसी भी देश को रास नही आ रहा है. यहां तक की भारत के साथ सीमा विवाद के बहाने चीन ने नेपाली सीमा में भी घुसने की कोशिश की थी. जिसे खुद नेपाल ने ही माना था कि चीन ने घुसपैठ की है. चीन अंतर्राष्ट्रीय मुद्दे पर चारों तरफ से घिरा हुआ है यही कारण है कि वह भारतीय उपमहाद्वीप के देशों से नजदीकियां बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. यहां पर गौर करने वाली बात यह है कि नेपाल सरकार द्वारा लेने जा रहे इस फैसले पर वहां की जनता का ही समर्थन नही है.

नेपाल के इस फैसले से उसका ही अनहित होने वाला है

भारत में इस समय करीब 30 हजार गोरखा सैनिक हैं. इन सैनिकों की भर्ती के लिए नेपाल में भारतीय सेना के तीन केन्द्र बनाए गए हैं. गोरखा सैनिकों को भारत सरकार 3000 करोड़ रुपये पेंशन के रुप में भेजती है.

गोरखा सैनिक

सबसे महत्वपूर्ण बात तो यहां यह है कि भारत या गोरखा रेजीमेंट ने कभी भी नेपाल के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई में हिस्सा नही लिया. भारत ने नेपाल को हमेशा छोटे भाई का दर्जा दिया है. दोनों देशो के बीच सीमा विवाद को लेकर कोई बड़ा मुद्दा भी नही है जिसे लेकर नेपाल में डर की स्थिति बन रही हो. ऐसे में गोरखा रेजीमेंट को समाप्त करने की नेपाल सरकार की कोशिश किसी को समझ नही आ रही है.

सही मायने मे देखा जाय तो प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की घरेलू राजनीति की वजह से भारत औऱ नेपाल के रिश्तों में दरार पैदा हुई है. केपी शर्मा ओली की उन्हीं के पार्टी के नेता पुष्प कमल दहल से अनबन चल रही है. उन्होंने केपी शर्मा ओली पर प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने का दबाव डाला लेकिन उसका कोई प्रभाव नही हुआ है.ॆ