पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने शरिया कानून का हवाला देते हुए कहा 15 साल से ऊपर की मुस्लिम लड़कियां कर सकती हैं शादी, यह बाल विवाह निषेध अधिनियम का उल्लंघन नहीं करेगा

पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया है. इस फैसले में हाईकोर्ट ने कहा है कि 15 साल या उससे अधिक उम्र की मुस्लिम लड़की अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी कर सकती है. कोर्ट ने कहा कि यह शादी वैध मानी जाएगी. जस्टिस विकास बहल की खंडपीठ ने फैसले में कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के अनुसार, मुस्लिम लड़कियों की शादी की उम्र 15 साल तय की गई है और बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 की धारा 12 को तहत ये शादी अमान्य नहीं मानी जाएगी.

बता दें कि 26 साल के जावेद ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी. इस याचिका में मांग की गई थी कि उसकी 16 साल की पत्नी को उसके साथ रहने की इजाजत दी जाए. लड़की फिलहाल हरियाणा के पंचकूला में एक बाल गृह में रह रही है. याचिकाकर्ता ने कहा कि शादी के समय उसकी पत्नी की उम्र 16 साल थी और यह शादी उनकी मर्जी से बिना किसी दबाव के हुई है. याचिकाकर्ता ने ये भी कहा कि दोनों मुसलमान हैं और उन्होंने एक मस्जिद में निकाह किया है. ऐसे में दोनों को साथ रहने की इजाजत दी जाए.

इस पर पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट ने माना कि उनकी शादी मुस्लिम कानून के अनुसार वैध है और कोर्ट ने पत्नी को उसके पति के साथ रहने की इजाजत दे दी. कोर्ट ने कहा कि एक मुस्लिम लड़की की शादी मुसलमानों को पर्सनल लॉ द्वारा शासित होती है और मुस्लिम कानून के सिद्धांत पर निर्भर करती है. मुस्लिम कानून के अनुच्छेद 195 के तहत 15 वर्ष मुस्लिम महिलाओं के लिए यौवन की आयु है और इस उम्र में वह अपनी मर्जी और सहमति से अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी कर सकती है.

बता दें कि बाल विवाह निषेध अधिनियम 2006 की धारा 12 के तहत लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल तय की गई है लेकिन कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तहत शादी को सही माना है.