Home विचार/मत पहले अंडे का ठेला तोड़ा, वीडियो वायरल होने के बाद बच्चों को...

पहले अंडे का ठेला तोड़ा, वीडियो वायरल होने के बाद बच्चों को मिली लाखों की मदद लेकिन अभी भी सो रहा है सिस्टम ?

कुछ दिन पहले ही इंदौर नगर निगम ने ताबड़तोड़ कार्रवाई करते हुए सड़क के किनारे दूकाने लगाने वालों के ठेले को या तो जप्त कर लिया था या फिर उन्हें वहीँ तोड़ दिया था, इसी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर बड़ी तेजी से वायरल हुआ था. जिसमें दो भाई अपनी दूकान तोड़े जाने से काफी नाराज और दुखी नजर आये थे, बच्चों ने अपनी दूकान बचाने के बहुत कोशिश की थी लेकिन नगर निगम ने उनकी एक ना सुनी और अंडे से भरे ठेले को पलट दिया था.

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो नेताओं को आई बच्चों की याद 

हालाँकि सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने एक बाद इन दो भाइयों की जो कहानी निकल कर सामने आई उससे हर किसी का दिल पसीज गया. दरअसल ये दो भाई पारस और नीलेश रायकवार पिछले कई वर्षों से मुसीबत झेल रहे हैं. लगभग दस साल पहले इनकी माँ का निधन हो गया था,इसके बाद बाप भी दूसरी शादी कर फरार हो गया. इन बच्चों का देखभाल करने वाला कोई नही था और ना रहने के लिए कोई घर था. ऐसे में ये बच्चे कई महीने तो मुक्तिधाम ( जहाँ लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता है) में रहते थे. बाद में ये रोड पर अंडे की दूकान लगाने लगे, जिसे नगर निगम ने तोड़ दिया था. हालाँकि वीडियो वायरल होने के बाद परिवार की मदद के लिए कई नेता आगे आये और फ़ोन कर मदद का भरोसा दिलाया.

आपको बता दें कि इन बच्चों के वीडियो वायरल होने के बाद इलाके के विधायक की भी नींद टूटी, तब दो नंबर विधानसभा क्षेत्र के विधायक रमेश मेंदोला ने दोनों बच्चों और उनके नाना को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत फ्लैट दिलवाने के लिए आवंटन पत्र दिया है और 2500 रुपये, साइकिल व चार जोड़ी कपड़े दिए हैं. इसके अलावा मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी तत्काल मदद पहुंचाते हुए परिवार को दस हजार रूपये दिए हैं. वहीँ राहुल गाँधी और अरविन्द केजरीवाल ने बच्चो से बात की है और केजरीवाल ने तो 5 लाख रूपये आर्थिक मदद करने का आश्वासन दिया है. इतना ही नही अब तो बाल आयोग की टीम भी नींद से जाग चुकी है और वे भी बच्चों तक मदद पहुंचाने की बात कर रहे हैं.

आखिर कहाँ सो रहा है हमारा नया सिस्टम? 

सोचने वाली बात है कि आखिरकार इन बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाएं इन बच्चों तक पहुँच क्यों नही पाती? इलाके के सांसद और विधायक कहाँ रहते हैं? बाल आयोग की टीम कहाँ सोयी रहती है? मुख्यमंत्री के अधिकारी आखिरकर इस तरफ ध्यान क्यों नही देते? नगर निगम के अधिकारी ऐसे असयाह बच्चों के लिए कोई योजना क्यों नही बना पाता? प्रधानमंत्री मोदी बच्चों के लिए बड़ी बड़ी बातें तो करते हैं लेकिन उनके अधिकारी, उनके नेता इन बच्चों तक मदद क्यों नही पहुंचा पाते?

सोचिये लॉकडाउन के दौरान काम धाम बंद होने के कारण लोगों को कितनी परेशानी का सामना करना पड़ा, ये बच्चे लॉकडाउन में बिना घर के कैसे रहे होंगे? आपको बता दें कि ये बच्चे अपने नाना जी के साथ, सड़क पर ही प्लास्टिक का घर बनाकर रहते हैं, खुद बनाते खाते हैं. नाना जी मोतियाबिंद के मरीज है. इन समस्याओं को आख़िरकार सरकार खुद क्यों नही देख पाती. वीडियो वायरल होने के बाद अब सभी इसका फायदा उठाने की कोशिश में लगे हुए हैं, किसी नेता ने पहले इन बच्चों की मदद के बारे में क्यों नही सोचा? क्या बच्चों के लिए काम करने के नाम पर लाखों रूपये ऐठने वाली संस्थाओं, अधिकारियों की जिम्मेदारी नही तय होनी चाहिए!

सरकार और सिस्टम को तब चुल्लू भर पानी डूब जाना चाहिए जब एक बच्ची अपने स्कॉलरशिप के पूरे पैसे इन बच्चों की मदद के लिए भेज देती है. जी हाँ मुंबई की रहने वाली बच्ची ने जब इन बच्चों का वीडियो देखा तो उसने स्कॉलरशिप से मिले 2000 रूपये इन बच्चों की मदद के लिए भेज दिया और हमारा नया सिस्टम अभी तक नए विकास के साथ सो रहा है ?