मुस्लिम संगठनों का ऐलान, ‘इस्लाम में दखलअंदाजी बर्दाश्त नहीं’, समान नागरिक संहिता के खिलाफ प्रस्ताव पारित

बड़ी खबर सामने आयी है। मुस्लिम संगठन जमीयत उलमा-ए-हिंद ने 29 मई को एक समान नागरिक संहिता को लागू करने के लिए कई राज्यों में भाजपा सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया। इस प्रस्ताव में कहा कि यह ‘इस्लामी कायदे कानूनों में साफ तौर पर दखलंदाजी करता है’, साथ ही उन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद और शाही ईदगाह के खिलाफ अभियान चलाकर पुराने विवादों को फिर से खड़ा करने वाली ‘सांप्रदायिक ताकतों’ और उनका समर्थन करने वाली ‘नकारात्मक और विभाजनकारी राजनीति’ को बाहर करने का आह्वान किया।

उत्तरप्रदेश के देवबंद में मुस्लिम संगठनों की सभा में पारित प्रस्ताव में है, ‘शादी, तलाक, खुला (जिसके जरिए एक महिला अपने पति को तलाक दे सकती है) विरासत आदि के नियम कानून किसी समाज, समुदाय, समूह या व्यक्ति के बनाए हुए नहीं हैं, बल्कि नमाज, रोजा, हज आदि की तरह ये हमारे मजहबी आदेशों का हिस्सा हैं, जो पवित्र कुरान और हदीसों से लिए गए हैं। इसलिए, उनमें किसी तरह का कोई बदलाव या किसी को उनका पालन करने से रोकना इस्लाम में स्पष्ट हस्तक्षेप और भारत के संविधान की धारा 25 में दी गई गारंटी के खिलाफ है। ’

इसमें आगे कहा गया है ‘इसके बावजूद अनेक राज्यों में सत्ताधारी सरकारें पर्सनल लॉ को खत्म करने की मंशा से यूसीसी को लागू करने की बात कर रहे हैं और संविधान व पिछली सरकारों के वादों को दरकिनार कर देश के संविधान की सच्ची भावना की अनदेखी करना चाहते हैं। जेयुएच यह साफ करना चाहती है कि कोई भी मुसलमान इस्लामी कायदे कानूनों में किसी भी तरह के दखल-अंदाजी को स्वीकार नहीं करता है। ’

जेयुएच के अरशद गुट के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा, ‘हमारी लड़ाई किसी हिंदू के साथ नहीं है, बल्कि सरकार में बैठे उन लोगों के साथ है जो देश का बंटवारा करके नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। ’

जेयुएच ने ज्ञानवापी मस्जिद और शाही ईदगाह के मुद्दों पर ‘प्राचीन धार्मिक स्थलों पर विवाद उठाकर देश की शांति को खराब करने की कोशिश करने वाली ताकतों और उनका समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों के रवैये के प्रति’ गहरी नाराजगी और नापसंदगी जाहिर की।