बड़ा खुलासा : मजदूरी के बाद भी पैसों के लिए शरीर सौंप रही हैं नाबालिग बच्चियां? सो रही है योगी सरकार, सो रही है पुलिस

आज हम इस खबर के जरिये आपको बेबसी की जो कहानी बताने जा रहे हैं वो पूरा सुनने के बाद आपका खून जरूर खौल उठेगा. खून खौल उठेगा इस सिस्टम के खिलाफ, खून खौल उठेगा सरकार खिलाफ, खून खौल उठेगा प्रशासन के खिलाफ और आपका खून खौल उठेगा उस नारे के खिलाफ.. जिसे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री बड़े बड़े मंच से गाते हैं. जी हां और अगर इस खबर के बाद भी आपका खून नही खौला, आपका कलेजा नही बैठा तो सोचियेगा कि क्या आपने अंदर सच में खून ही दौड़ रहा है!

दरिंदगी की सारे हदें पार, प्रशासन हैं अँधा और बहरा 

ये खबर है बुंदेलखंड के चित्रकूट का. जहाँ पर गरीबी से लाचार परिवार खाने के लिए वो सब करने के लिए मजबूर हैं जो शायद आप सोच भी नही सकते.. अब हम आपको सीधे सीधे खबर बताते हैं. दरअसल बुंदेलखंड के चित्रकूट से खबर सामने आई है कि यहाँ छोटी छोटी बच्चिओं को काम करने, पैसा कमाने के बदले अपने शरीर को ठेकेदारों और काम देने वालों को सौंपना पड़ता है, साधारण भाषा में कहे तो बच्चियां अपने शरीर को दरिदों की हवस बुझाने के लिए देती है तब जाकर उन्हें काम मिल पाता है, इसके बाद जब पैसे लेने के बारी आती है तब फिर उन्हें अपना शरीर सौंपना पड़ता है फिर पैसा मिलता है वो भी काट-पीट कर..

इन बच्चियों से गरीबी ने तो पहले ही किताब और कलम छीन चुकी है और अब दिन प्रतिदिन अपना तन भी दरिदों को सौंप कर आती है. इन बच्चियों की उम्र महज 14-15-16 साल है. जो गरीबी से मजबूर होकर, अपने परिवार के पेट के लिए, दो वक्त की रोटी के लिए किताब, कलम छोड़कर काम करने तो चली जाती है लेकिन यही शुरू होता है इन बच्चियों के शरीर को नोचना..

काम चाहिए तो पहले शरीर दो !

दरअसल ये खबर सामने आई है आज तक चैनल के एक रिपोर्ट से… जिसमें साफ़ साफ़ बच्चियों ने कहा कि हम काम मांगने जाते हैं तो वे हमसे हमारा शरीर मांगते हैं, कहते हैं अगर शरीर दोगे तो काम मिलेगा.. इतना नही है इन बच्चियों को मजदूरी देने के लिए भी ऐसे ही शर्त दी जाती है कि अगर मजदूरी चाहिए तो पहले शरीर देना पड़ेगा. इन बच्चियों की माँ सब जानते हुए भी लाचार है, लाचार बाप बच्चियों की पीड़ा जानते हुए भी खाट पर लेते हुए हैं क्योंकि मजबूरी है साहब.. मजबूरी दो वक्त की रोटी.. मजबूरी पेट भरने की… मजबूरी बीमार बाप का इलाज करवाने की.

हालाँकि सबसे हैरान कर देने वाली बात तो ये है कि इस इलाके तक ना तो सरकार की योजनायें पहुँचती और ना ही प्रशासन की नजर… ना बच्चियों से जुडी संस्थाएं पहुँचती हैं और ना ही सरकार के बेटी बचाओ बेटी पढाओं के नारे की आवाज… ना स्वयंसेवी संस्थाओं को इस घिनौनी घटना की जानकारी होती है और ना ही राज्य की सरकार, जिला प्रशासन और ना ही बाल विकास मंत्रालय के अधिकारियों को..

प्रधानमंत्री कितना भी नारा देते हो कि बेटी बचाओ बेटी पढाओ… मुख्यमंत्री कितनी भी कन्याओं के पैर धुलते हो लेकिन असल में कन्याओं के साथ क्या हो रहा है आजतक की टीम ने इसका खुलासा किया है. इस खुलासे के बाद जो घिनौनी, शर्मनाक खबर निकल कर सामने आई है इसके लिए क्या स्थानीय प्रशासन को माफ़ किया जा सकता है? क्या इस घटना के बाद बच्चों के लिए काम करने के नाम पर पैसा एंठने वाली संस्थाओं की जिम्मेदारी नही तय होनी चाहिए? क्या परिवार की जानकारी के बाद जिस तरह बच्चियां मजबूरी में अपने शरीर को बेच रही है उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए या नही!

हकीकत को देखिये, पहचानिए, समझिये

आँख भर आती है उस बच्ची का बयान सुनकर.. दिल पसीज जाता है उस बेबस माँ की बात सुनकर.. दिल बैठने लगता है लाचार बाप की मजबूरी सुनकर…  खून खौल उठता है पूरी घटना सुनकर.. आँख लाल हो जाती है सरकार के दावे सुनकर..और शर्म आती है इन बच्चियों का शोषण करने वाले दरिंदो को इंसान बोलकर… हकीकत को देखिये, पहचानिए, समझिये
क्या नही खौला आपका खून?

इस मामले को लेकर क्या कारवाई होती है? किस- किस पर कार्रवाई होती है? इन सब पर हमारी नजर है.
आपको इस पूरी घटना के बारे में क्या सोचते हैं कमेन्ट करके जरूर बताइये