अब कस्टडी के मामले में बच्चा ही होगा जज

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच ने एक के मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि बच्चे की प्राथमिकता ही निर्धारित करेंगी कि कस्टडी किसे मिलेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अपने विशेषाधिकार अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए कहा की कस्टडी के मामले में बच्चे का हित ही सर्वोपरि होगा। दरसल इस मामले में कोर्ट को यह तय करना था कि बच्चे की कस्टडी सिंगापुर में रह रही मांँ को दी जाए या बेंगलुरु में रह रहे पिता को। कोर्ट के निर्णय के अनुसार बच्चे की सिंगापुर में रह रही मां को कस्टडी मिली लेकिन साथ ही पिता को बच्चे के साथ विजिटिंग और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के अधिकार भी दिए।

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जानिए क्या है पूरा मामला

इस मामले में याचिकाकर्ता यानी बच्चे की मां सिंगापुर में नौकरी करती है और वह बच्चे की कस्टडी लेना चाहती हैं। बच्चे के पिता यहां भारत में बेंगलुरु में रहते हैं। मामले की सुनवाई के दौरान बच्चे ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट को यह संकेत दिए कि वो अपनी मां के साथ रहना चाहता है पर वह अपने पिता से भी लगाव रखता है। सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय देने से पहले याचिकाकर्ता से कहा कानूनन लिखित रूप में यह विश्वास दिलाएं कि वह कोर्ट के द्वारा लगाए गए शर्तों का पालन करेगी। कोर्ट ने बच्चे और पिता के मिलने और बातचीत करने के लिए भी कई दिशा-निर्देश दिए हैं जो कि पिता और माता दोनों को निभाने होंगे।

कस्टडी
Photo – Social Media

कस्टडी के लिए कौन से कानून हैं महत्वपूर्ण

सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे की अंतरराष्ट्रीय कस्टडी के फैसले में गार्ड‌ीअन एंड वार्ड एक्ट 1890 की धारा 17 (3) का उपयोग किया, जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि कोर्ट नाबालिग की प्राथमिकताओं पर विचार कर सकता है, यदि वह इतना बड़ा/बड़ी है कि विवेकपूर्ण प्र‌ाथम‌िकताएं तय कर पाए। कोर्ट ने कहा, “धारा 17 (3) के अनुसार, नाबालिग बच्चे की कस्टडी के मुद्दे को निर्धारित करने के लिए बच्चे की प्राथमिकताएं और झुकाव महत्वपूर्ण हैं। धारा 17 (5) में यह प्रावधान है कि बच्‍चे की इच्छा के विरुद्ध अदालत किसी व्यक्ति को अभिभावक नियुक्त या घोषित नहीं कर सकता।”